क्षणिकाएं

जख्म

सूरज के चेहरे पर
घाव हो गया
सारी मरहम
चांद ले गया
जख्म नासूर बन रहा है
चांद हंस रहा है
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निष्कर्ष

एक निष्कर्ष
जंगल कटते जा रहे हैं
जंगली बढ़ते जा रहे हैं
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शरबत

हाथों में लहू के जाम
चेहरे पर आत्मीयता का नकाब

कोई नहीं पहचानता
लहू किसका है यह
सभी समझते हैं
वे तो शरबत पी रहे हैं।
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