अकेलेपन का साथी

आज अकेलेपन को ही
बना लेते हैं साथी
फिर चलते हैं
तन्हाईयों में
फिर
देखते हैं
क्या कहती हैं
ख़ामोशियाँ चुपके से
उदासियाँ रहेंगी
या लौट जायेंगी
दबे पैर
किसी ख़ुशी को लेने
ज़िंदगी मुस्करायेगी कभी
एक पल को ही सही
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राजेश”ललित”शर्मा

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राजेश"ललित" शर्मा

एक अध्यापक पर पिछले ४० वर्षों से लिखना,पढ़ना,राष्ट्र एवं समाज सेवा अध्यात्म चिंतन, साहित्य सेवा आदि कार्यों में संलग्न।

This Post Has One Comment

  1. अकेलापन भी साथी हो सकता है।कविता में गम्भीर प्रयोग।

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