आज अकेलेपन को ही
बना लेते हैं साथी
फिर चलते हैं
तन्हाईयों में
फिर
देखते हैं
क्या कहती हैं
ख़ामोशियाँ चुपके से
उदासियाँ रहेंगी
या लौट जायेंगी
दबे पैर
किसी ख़ुशी को लेने
ज़िंदगी मुस्करायेगी कभी
एक पल को ही सही
————————–
राजेश”ललित”शर्मा

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One Comment

  1. दीपेश शर्मा

    अकेलापन भी साथी हो सकता है।कविता में गम्भीर प्रयोग।

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