हम सिर्फ नाम के बड़े है

हम सिर्फ नाम के बड़े है
बस मूर्ती बने खड़े है

हाथ दोनों बँधे, मुहं सिले है
आँखे पथरा गई, कान सुनने को तरसते  है

लोग आते जाते तो दिखते है
पर बड़ो के लिए समय नहीं है

फूलो की बगिया बनाई थी
पौधो को पेड़ बनाया था

फल और फूल तो वैसे ही खिलते है
पर ये सब हमारे मुकदर में नहीं है
(संजीव कुमार बर्मन)

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