कविता लिखती

🏵️ कविता लिखती धुन में रहती यूहीं मगन धूम रही
🏵️पुरवाई हवा रेशम सी लगे छूकर मुझे जाती है यूहीं

🏵️ऐसा लगता जैसे मैं हवाओं मैं हूँ तैर रही
🏵️बगिया में गयी स्वागत मेरा फूलों ने किया

🏵️हंस हंस के कहे बेला मुझसे बड़े दिनों में आयी हो
🏵️गुड़हल देख मुझे सुर्ख लाल रंग के हो जाते

🏵️हरश्रंगार देख देख मुझे खुशबू सी हैं भर जाते
🏵️कविता लिखती धुन में रहती यूहीं मगन धूम रही

🏵️कुछ चंचल मस्त मौला सी किसी की परवाह करती नहीं
🏵️ऐसा लगता जैसे चांद कहे आज बड़ी खुश धूम रही

🏵️बोली उससे कविता का मैं गधाशं बनी धूम रही
🏵️आज सांझ भी इठलाती मुझको छाया देके चली गई

🏵️हूँ किस्मत वाली इन्द्रधनुषी जैसे रंगों में रंगी
🏵️कविता लिखती धुन में रहती यूहीं मगन धूम रही

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