शादी का बजट

शादी का बजट

By |2017-08-09T21:40:33+00:00August 9th, 2017|Categories: कविता, कहानी|0 Comments

सुबह से ही शर्मा जी के घर में भागदौड़ का माहौल था। आज उनकी एकमात्र लड़की संस्कृति को देखने लड़के वाले आ रहे हैं। संस्कृति अपने नाम के अनुसार ही गुणों वाली पढ़ी लिखी लड़की है। अभी हाल ही में उसने एक नामी विश्वविघालय से संस्कृत विषय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। शर्मा जी के परिवार में केवल वो, उनकी पत्नी राधा व संस्कृति ये तीन ही सदस्य हैं। अतः आज ज्यादा भागदौड़ होना लाज़मी है।

संस्कृति ने पूरे रसोई घर का कार्य सम्भाल रखा है, उसकी माँ भी इस कार्य में उसकी मदद कर रही है। शर्मा जी मेहमानों के बैठने आदि की व्यवस्था करके उनकी प्रतिक्षा में द्वार पर ही नजर जमाये बैठे हैं। दो कुर्सी सोफा के बाजू में फिर सोफा के सामने दो कुर्सी, बीच में एक बड़ी सी टेबल जिस पर कुछ दैनिक समाचार पत्र पड़े हैं। टेबल के नीचे के हिस्से में कुछ पत्रिकायें पड़ी हैं।

वैसे तो कई रिश्तेदार हैं हमारे परन्तु आज काम के समय आने को कहा तो किसी ने हाँ तक नहीं किया !! (रसोई घर से श्रीमती शर्मा ने तुनक भरे अन्दाज में शर्मा जी को सम्बोधित करते हुये कहा)

अरे भई सभी अपनी नौकरीपेशा जिन्दगी की वजह से काफी दूर-दूर रहते हैं, अतः नहीं आ सकते हैं और सभी ने शादी में आने के लिये कहा तो है। तुम हम नौकरीपेशा लोगों की मजबूरियाँ नहीं समझ सकती। छुट्टी लेने में कितनी दिक्कतें होती है, बार-बार अफसरों के आगे-पीछे घूमने पर एक बार की छुट्टी मिलती है। अब अगर वो लोग अभी छुट्टी ले लेते तो शादी में कैसे आते, शादी तो दूर की बात है अभी कौनसी बात पक्की हो ही गई है, अच्छा है जो कोई नहीं आया!!, फालतू में आने-जाने का खर्चा ओर गले पड़ जाता बेचारों के।

शर्मा जी की इतनी लम्बी बात सुनकर राधा मुँह मोड़ते हुये बोली – आप शायद भूल गये हो कि आप रिटायर पोस्टमास्टर हो, इसलिये ‘हम’ शब्द का सोच-समझकर प्रयोग करो।

अभी कुछ साल ही हुये हैं शर्मा जी को रिटायर हुए। पूरी नौकरी उन्होंने बड़े ही ईमानदारी पूर्वक पूर्ण की, इसी वजह से उनका चारों तरफ काफी नाम भी है। मध्यमवर्गीय परिवारों के पास नाम के अतिरिक्त और होता ही क्या है?

शर्मा जी हॉल में चक्कर लगा रहे थे और बार-बार अन्जानी आहट महसूस करके दरवाजे की ओर दौड़ पड़ते थे, थक हार कर वो दरवाजे के ही सहारे खड़े हो गये और कभी अन्दर तो कभी बाहर देखने लगे, कभी-कभी बीच-बीच में रसोईघर का मुआयना भी कर आते, परन्तु पत्नी की तेज आँखें देखते ही दहलीज से ही लोटना पड़ जाता था। तभी गाड़ी के हॉर्न की आवाज आयी और शर्मा जी ने दरवाजे से लपक कर देखा तो गाड़ी उन्हीं के घर के दरवाजे पर आकर रुकी। शर्मा जी रसोई की तरफ आकर धीरे से बोले –

अरे सुनती हो, लगता है वो लोग आ गये, इतना कहकर वो फिर दरवाजे की तरफ लपके तभी अचानक उनकी नजर बीच में रखे सोफे पर पड़ी जिसके कवर का एक कोना थोड़ा सा नीचे ज्यादा लटका हुआ था, वो तुरन्त बड़बड़ाते हुये सोफे की तरफ लपके और उसे ठीक कर ही रहे थे कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

शर्मा जी…… अन्दर आ जायें ….

अरे आईये…. आईये …..

(शर्मा जी ने गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुये मेहमानों का स्वागत किया।)

मेहमानों में लड़के व उसके माता-पिता थे।

मेहमान बैठे, एक-दूसरे का परिचय हुआ और कुछ देर बाद चाय-नाश्ता मंगवाया गया।

चाय-नाश्ता मंगवाना केवल मात्र एक इशारा होता है कि अब लड़की को बुलाया जा सकता है।

इशारा पाते ही राधा संस्कृति को लेकर हॉल की तरफ बढ़ी चली आयी।

संस्कृति साड़ी में बहुत ही सादगी से भारतीय संस्कारों को समेटे हुये नाश्ते की प्लेट लेकर हॉल में आयी और टेबल पर रखकर वहीं पास ही खड़ी हो गयी। बातों का सिलसिला पहले से ही चालू था, कभी लड़का संस्कृति को देख रहा था तो कभी संस्कृति चुपके से लड़के को ताक रही थी।

कुछ देर बाद लड़के और लड़की को अकेले में बात करने का मौका दिया गया, तदनन्तर दोनों की रजामंदी लेकर शादी की आगे की बातें होने लगी। थोड़ी चर्चाओं के बाद दहेज के रूप में 5 लाख नगद व एक गाड़ी देने का वादा कर शर्मा जी ने मेहमानों को विदा किया।

शर्मा जी के फैसले से राधा और संस्कृति दोनों ही खुश नहीं थी।

अरे भाई लड़का अध्यापक है, लड़के का बाप भी अध्यापक है, तो कम से कम इतना दहेज तो लेंगें ही और मेरी केवल एक मात्र बेटी है अतः उसके लिये मुझे अपने मन की करने दो बस यही मेरी एक अन्तिम ईच्छा है। (शर्मा जी के इतना कहने पर वो लोग आगे नहीं बोल पायी।)

शादी की तैयारियाँ जोर-शोर से शुरू होने लगी, होती भी क्यों नहीं केवल दो ही महीने बचे थे और तैयारियाँ ढेरों थी। इन्हीं तैयारियों के बीच कुछ दिनों से शर्मा जी थोड़े बुझे-बुझे से दिखने लगे थे, उनके चेहरे पर अब केवल झूठी हँसी ही दिखाई देती थी। बेटी की शादी की तो उनको बहुत खुशी थी पर कोई बात थी जो उनको अन्दर ही अन्दर परेशान कर रही थी। रास्ते में आते-जाते जब लोग उनको बेटी की शादी की बधाई देते तो वो एक फिकी सी मुस्कान दे देते थे।

आज फिर दिन भर भागदौड़ के बाद थक हार कर शर्मा जी घर पर लौटे थे, बहुत परेशान थे, आज तो खाना भी नहीं खाया और सीधे अपने बिस्तर पर जाकर लेट गये। राधा व संस्कृति उनके इस रवैये से थोड़े हैरान थी। सब काम निपटा कर करीब रात को 9 बजे राधा कमरे में आयी तो देखा शर्मा जी बिस्तर पर दीवार की तरफ मुँह घुमाये सो रहे हैं।

शायद सो गये हैं… (इतना कहकर राधा भी पैर सीधे कर पलंग पर बैठ गयी, तभी देखा कि शर्मा जी सोये नहीं केवल मुँह घुमाकर कुछ सोच रहे हैं)

क्या हुआ?? नींद नहीं आ रही??

हूँ ……

क्या हुआ?? कुछ दिनों से देख रही हूँ काफी परेशान दिखाई दे रहे हो !!

कुछ नहीं ………………

कुछ तो है …. देखिये जो कुछ है घर में बतायेंगें तो ज्यादा अच्छा रहेगा .. ऐसे ही खुद अन्दर ही अन्दर घुटते रहोगे तो सेहत पर बुरा असर पड़ेगा। मैं देख रही हूँ, पहले जब शादी की बात भी चलती थी तो आप बहुत खुश होते थे, परन्तु आजकल आप बहुत ही परेशान से दिखाई दे रहे हैं।

कुछ नहीं वो शादी….. (इतना कहकर शर्मा जी चुप हो गये, शायद सोच रहे होंगे कि फालतू की चिन्ता में परिवार को डालने से कोई फायदा नहीं।)

क्या शादी… ?? आगे बोलिये … क्या लड़के वालों से कोई बात हुई ???

नहीं लड़के वालों की बात नहीं है !!

तो फिर कौनसी बात है जो आप इतने परेशान दिखाई दे रहे हैं? क्या पैसों की दिक्कत है?

हुं.. पैसे पूरे नहीं हो पा रहे…

क्या??? हाय राम … आपकी बचत … फिक्स्ड डिजोजिट … आदि देखते!

सब कुछ देख लिया.. बेटी की पढ़ाई, तुम्हारी आँखों का ऑपरेशन, मेरी दमा की दवाईयों के बाद जो रकम बची है कुल मिलाकर 10 लाख के आस-पास ईकठ्ठे हुये हैं, इनमें मेरी आँखों के ऑपरेशन के लिये जो बचा रखे थे वो भी शामिल है, जबकि खर्चे का जोड़ लगभग 20 से 25 लाख होगा …

5 लाख नकद, 5 लाख की गाड़ी, कम से कम 5 लाख का गार्डन, बाकी खाने का पीने का, रिश्तेदारों का, बेटी के गहने, बाकी का दहेज, सब कुछ मिलाकर इस मंहगाई के जमाने में 20 से 25 लाख के आस पास खर्च होने का अनुमान है। (शर्मा जी की आवाज में एक निराशा की झलक दिखाई दे रही थी)।

राधा ने कुछ सोचा और उठकर पास रखी अलमिरा खोलकर उसमें से कुछ खोज बीन करने लगी।

क्या ढूंढ रही हो ???

शर्मा जी आगे कुछ बोलते उससे पहले ही उनके सामने एक गठरी थी, उन्होंने उसे खोलकर देखा तो उसमें राधा के कुछ जेवरात थे।

ये सब क्या है?

ये मेरे जेवरात हैं.. देखिये कितने के होते हैं!!

राधा द्वारा एक मिनट भी सोचे बिना किये गये इस काम से शर्मा जी की आँखों में आँसू भर आये और वो रुंधे गले से बोले…

पर मैं तुम्हारे गहने… कैसे ??

मेरे गहने !! कौन से मेरे गहने ??? मेरे गहने तो आप और आपकी खुशियाँ हैं और फिर आप हमारी बेटी के भविष्य के लिये ही ये सब कुछ कर रहे हैं ना, अगर आपके सुख-दुःख में मैं आपका साथ नहीं दूंगी तो मुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी।

वो राधा जो हमेशा शर्मा जी को आँख दिखाती रहती थी उसकी ऐसी बातें सुनकर शर्मा जी को अपने भाग्य पर गर्व होने लगा।

परन्तु इन सब को मिलाकर भी 5 लाख तक का और इन्तजाम हो सकता है। बाकी, अभी भी लगभग 10 लाख के आस पास का इन्तजाम कैसे करूं, ये कोई छोटी-मोटी रकम तो है नहीं। अपना तो कोई रिश्तेदार भी ऐसा नहीं है जिससे कुछ माँग सकें और मांगें भी तो किस दम पर, नौकरी है नहीं, जो पेन्शन आती है उससे तो केवल घर खर्च ही चल पाता है। प्रोपर्टी के नाम पर केवल यह घर बचा है।

शर्मा जी बात करते-करते खाँसने लगे, राधा ने उनको पानी का गिलास देते हुए कहा –

हाँ तो इस घर को गिरवी रख दीजिये … फिर शादी के बाद इसको बेचकर कोई छोटा-मोटा घर ले लेंगें, वैसे भी हम दो लोग इतने बड़े घर में रहकर करेंगें भी क्या ??

राधा की बात सुनकर शर्मा की आँखों में रोशनी का पुनः संचार हुआ, परन्तु अभी भी निराशा की छाया उनकी आँखों में स्पष्ट दिखाई दे रही थी।

पर घर कैसे ???

कैसे वैसे छोड़िये मैं कागज लाती हूँ सुबह ही जाईये और घर को गिरवी रखकर बाकी के पैसों का इन्तजाम कर लिजिये। (इतना कहकर राधा घर के कागज ढूंढने लगी)

अच्छा तो ऐसा करो ये जेवर तुम्हारे रख लो क्योंकि जब घर ही गिरवी रखना है तो इनको बेचने का कोई फायदा नहीं घर गिरवी रखने से तो काफी पैसे मिल ही जायेंगें।

शर्मा जी पोटली लेकर अलमिरा की तरफ बढ़ गये और पोटली अलमिरा में रख दी। राधा ने उन्हें घर के कागज दे दिये। शर्मा जी ने कागज तो नहीं लिये परन्तु भाव-विभोर हो राधा को अपने गले से लगा लिया और राधे..कहकर आँसू टपकाने लगे। आज बरसों बाद शर्मा जी ने राधा को राधे.. नाम से सम्बोधित किया था और गले से भी लगाया था तो राधा भी भाव विभोर हो आँसू बहाने लगी।

उनकी ये सभी बातें संस्कृति बाहर दरवाजे के बाहर खड़ी-खड़ी सुन रही थी, वो भी वहाँ खड़ी-खड़ी आँसू बहाने लगी और मन ही मन खुद को कोसने लगी। सोचने लगी कि उसकी वजह से ही घरवालों की यह स्थिति हो रही ही। उसकी सिसक को अन्दर खड़े माँ-बाप ने सुन लिया अतः उन्होंने आवाज लगाई –

कौन ?? संस्कृति !! बेटा तू है क्या वहाँ ??

हाँ !! पापा !!

संस्कृति की आवाज स्पष्ट बता रही थी कि वो रो रही थी।

बेटा क्या हुआ?? (शर्मा जी ने दरवाजे की तरफ बढ़ते हुये पूछा)

कुछ नहीं पापा !! मुझे ये शादी नहीं करनी !!

ना बेटा!! ना!! ऐसी बातें नहीं करते !! क्यों क्या हुआ ?? कुछ ऐसी-वैसी बात हुई क्या??

नहीं पापा!! आप उन लालचियों की झोली भरने के लिये अपना सब कुछ दाव पर लगा रहे हो, यहाँ तक की घर भी गिरवी रख रहे हो, मुझे ऐसे घर में नहीं जाना।

नहीं बेटा!! ऐसे नहीं कहते! मेरा सब कुछ तो तेरा ही है, अब और कितनी जिन्दगी बची है हमारे पास, वैसे भी तेरी शादी के बाद हमें अकेले ही रहना है तो हम क्या करेंगें इस घर का और इस पैसे का।

मुश्किल से संस्कृति को चुप करा कर कमरे में भिजवाया और वो लोग भी बातें करते हुये सो गये।

दूसरे दिन सुबह जल्दी ही शर्मा जी तैयार होकर घर के कागज ले बाहर चले गये और दोपहर तक पैसों का इन्तजाम कर खुशी-खुशी वापस आ गये। शर्मा जी नये घर खरीदने से भी ज्यादा खुश नजर आ रहे थे। उनकी बेटी की शादी निर्विघ्न हो जायेगी शायद इस बात की खुशी ने उनके घर गिरवी होने के गम को दबा दिया था।

आखिरकार शादी का दिन आ गया, सब बढ़िया तैयारियाँ थी, शर्मा जी ने दिल खोलकर खर्चा किया था, आस-पड़ौस वाले, सब रिश्तेदार आदि सभी उनकी तारीफ किये जा रहे थे।

इतने में किसी ने कहा कि बारात आ गयी तो शर्मा जी, राधा व सभी रिश्तेदार बारात के स्वागत के लिये आगे बढ़ गये। बारातियों का अच्छे से स्वागत किया गया। थोड़ी देर बाद वरमाला का वक्त हुआ तो दुल्हन को बुलवाया गया …

राधा ने कुछ देर इन्तजार किया संस्कृति को आते नहीं देखा तो शर्मा जी का ईशारा पाकर खुद संस्कृति को लेने चली गयी।

संस्कृति.. बेटा संस्कृति .. कहाँ है ??

क्या पता चाची जी हमने भी काफी ढूंढा पर कहीं दिखी नहीं …

बाथरूम में देखा क्या तुम लोगों ने !!

हाँ.. हाँ.. वहाँ भी देखा !!

कहाँ गयी ये लड़की !! (इतना कहकर राधा कमरे में इधर-उधर ताकने लगी, तभी पीछे से शर्मा जी आ गये)

क्या हुआ कहाँ है संस्कृति ?? कब से सब नीचे इन्तजार कर रहे हैं और तुम भी यहाँ आकर बैठ गयी !!

संस्कृति के पापा, संस्कृति नहीं मिल रही है।

नहीं मिल रही मतलब, कहाँ गयी ??

पता नहीं (राधा ने रोते हुये कहा)

राधा की बातों से शर्मा जी को धक्का सा लगा और वो अपनी नजर इधर-उधर दौड़ाने लगे, तभी उन्हें शादी का जोड़ा दिखाई दिया, पास जाकर उन्होंने देखा तो उसके ऊपर एक पत्र पड़ा था जिसमें लिखा था –

पापा मैं किसी ओर को चाहती हूँ, अतः ये शादी मैं नहीं कर सकती, मैंने पहले भी आपको कई बार बताने की कोशिश की पर आप इतने खुश थे कि मैं आपकी खुशियों में विघ्न डालना नहीं चाहती थी। परन्तु मैं अब और झूठी जिन्दगी नहीं जी सकती। अतः मैं जिससे प्रेम करती हूँ उसके साथ जा रही हूँ। एक बात और पापा प्लीज मेरी खुशी के लिये मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना।

उम्मीद करती हूँ कि आप मुझे माफ कर दोगे और हमेशा स्वस्थ व प्रसन्न रहोगे।

आपकी

संस्कृति

पत्र पढ़ते-पढ़ते शर्मा जी को चक्कर सा आने लगा और वो धड़ाम से पलंग पर गिर पड़े।

हाय राम.. ये इन्हें क्या हो गया?? अरे कोई डॉक्टर को बुलाओ !! अरे कोई पानी तो लाओ, संस्कृति के पापा,, संस्कृति के पापा,,, उठिये !! हे भगवान् ये इन्हें क्या हो गया ??

राधा के दहाड़ मारके रोने से वहाँ सभी रिश्तेदारों, बारातियों, पड़ोसियों की भीड़ इकठ्ठी हो गयी, उन्हीं में से एक डॉक्टर भी थे, उन्होंने आकर शर्मा जी का चेकअप किया, फिर कुछ पानी के छींटे शर्मा जी के मुँह पर मारे, छींटे मारते ही शर्मा जी चिल्लाते हुये उठे-

संस्कृति!!!! संस्कृति!! ये तूने क्या किया बेटी ??? (इतना कहकर शर्मा जी अपना सिर पीटने लगे)

तब तक संस्कृति का पत्र अन्य लोगों ने भी पढ़ लिया था। फलस्वरूप आपसी कुचर्चायें होना शुरू हो गयी थी। कोई बेटी को दोष दे रहा था, तो कोई माँ-बाप को, यहाँ तक कि उनके कई सगे रिश्तेदार भी उनके संस्कारों तक को दोष दे रहे थे।

आस-पड़ोस की महिलायें भी उसके चरित्र पर कीचड़ उछालने में लगी हुई थी, कोई बेशर्म कह रही थी तो कोई बदचलन, इतने लोगों में से कोई भी ऐसा नहीं था जो बेचारे दुःखी माँ-बाप के दिलों पर मरहम लगने वाली बात करते। रही सही कसर लड़के के पिता ने पूरी कर दी –

शर्मा जी!! मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। आप एक बदचलन लड़की को हमारे पल्ले बांधने जा रहे थे!!

उनकी बात पूरी होती उससे पहले ही उनकी श्रीमती जी ने अपना राग अलाप दिया-

अरे वो तो हमारे अच्छे कर्मों ने हमें बचा लिया नहीं तो बेचारे हमारे बेटे की जिन्दगी बर्बाद हो जाती। ऐसी कुल्टा को तो भगवान् जन्म ही क्यों देता है पता नहीं?

शर्मा जी व उनकी पत्नी लगातार रोये जा रहे थे एवं रिश्तेदार, आस-पड़ोसी, बाराती सभी उनको कोसे जा रहे थे और सुनाये जा रहे थे। तभी भीड़ में से किसी ने जोर से कहा –

अरे अब ऐसे संस्कार दिये हैं तो भुगतो!! तुम लोगों की किस्मत में रोना ही है तो रोओ, चलो भाईयों ऐसे लोगों के घर खाना तो छोड़ पानी पीना भी नरक भोगने के समान है।

उसके इतना कहते ही सब लोग अपने अपने घर के लिये रवाना हो गये, बेचारे शर्मा जी व उनकी पत्नी रोते बिलखते सुबह तक अचेत से होकर पड़े रहे।

सुबह-सुबह शर्मा जी थोड़े से सम्भले और बोले –

सुनो संस्कृति की कोई फोटो है क्या घर में ?

हाँ है, पर क्यों?

पुलिस थाने जा रहा हूँ, उसकी गुमसुदगी की रिपोर्ट कराने, वहाँ वो लोग मांगेंगें।

क्या?? पहले ही क्या कम बदनामी हो चुकी है उस चुड़ैल की वजह से जो अब उसकी खोज-बीन में निकल रहे हो!!

राधा की बिलखती रोती हुई आवाज ने एक बार फिर शर्मा जी के थमे हुये आँसुओं को छलकने का निमंत्रण दे दिया।

कुछ भी हो वो मेरी बेटी है इसलिये मुझे उसे ढूंढना है।

और ढूंढ के क्या करोगे? घर में सजाओगे। क्योंकि अब उससे कोई शादी-विवाह तो करेगा नहीं, अरे उसकी शादी क्या लोग तो हम लोगों का भी मुँह देखना पसन्द नहीं करते। उसको ले आओगे तो घर में रहना मुश्किल हो जायेगा।

नहीं फिर भी मुझे उसे ढूंढना है।

इस बार शर्मा जी की आवाज में कठोरपन था।

अच्छी बात है जाओ !! बस मुझे ये बता दो कि उसका ढूंढ कर करोगे क्या???

राधा का रोना अब भी जारी था।

एक बार फिर शर्मा जी बिलखने लगे और अपने भरे गले से रोते हुये बोले –

पूछूँगा उससे, मैंने ऐसा क्या गुनाह किया जो उसने मुझे इतनी बड़ी सजा दी?? उसने जो चाहा मैंने दिया, उसकी खुशी के खातिर अपना घर तक गिरवी रख दिया, फिर भी उसने ऐसा क्यों किया?? अरे लड़का पसन्द नहीं था तो बता देती, उसकी पसन्द का जो लड़का है उससे मिला देती या फिर शादी से पहले ही मना कर देती, कम से कम हमारी इतनी बदनामी तो नहीं होती।

नहीं…… नहीं…… मेरी बेटी ऐसा नहीं कर सकती !! तुम… तुम… भी तो थी उस रात … जब वो हमारे दुःख पर रो रही थी …. थी ना तुम वहाँ??? क्या तुम्हें याद नहीं ?? तुम्हें क्या लगता है जो बेटी हमारे दुःखी होने के खयाल से भी इतना रो रही थी वो हमें ऐसे दुःख देकर जा सकती है … नहीं.नहीं.. मेरा दिल नहीं मानता….

शर्मा जी की बातों से राधा का रोना कम हो गया था और वो भी किसी अनहोनी की आशंका में बोली –

कहीं किसी ने हमारी बेटी का अपहरण तो नहीं कर लिया… नहीं ऐसा होता तो वो पत्र…

अरे पागल पत्र तो कोई दूसरा भी लिख सकता है !! तू.तू. तू…. जल्दी जा और संस्कृति की फोटो ला, मैं अभी पुलिस थाने जाता हूँ। और हाँ वो पत्र भी लेती आना !!

पर फोटो तो घर पर है!!

तो चल जल्दी घर पर!!

घर गार्डन से ज्यादा दूर नहीं था अतः पैदल ही दो मिनट में घर पहुँच गये।

घर पहुँचते ही राधा ने बिना किसी सवाल के फोटो एवं पत्र शर्मा जी के हाथ में थमा दिये।

शर्मा जी बिना मुँह धोये पुलिस थाने की ओर दोड़ पड़े और राधा वहीं चौखट पर बैठी रह गयी।

थाने में सीधे घुसते देख एक हवलदार ने उन्हें रोक लिया।

ऐ रुको!, कहाँ घुसे जा रहे हो??

साहब.. मुझे एक रिपोर्ट लिखवानी है, बड़े साहब से मिलने दीजिये, आपकी बड़ी मेहरबानी होगी।

अरे पर क्यों मिलना है साहब से? साहब बड़े व्यस्त हैं, तुम मुझे ही बता दो क्या हुआ?

हवलदार के द्वारा सीधे प्रश्न पूछे जाने पर शर्मा जी खामोश हो गये, आखिर बतायें भी तो किस मुँह से कि उनकी बेटी ने क्या किया है ????

क्या हुआ चाचा?? बताओ क्या काम है साहब से ??

वो.. मुझे एक रिपोर्ट लिखवानी है।

क्या रिपोर्ट????

साहब कल रात से मेरी बेटी घर से गायब है, उसका कहीं पता नहीं चल रहा है, पता नहीं कहाँ चली गयी?? साहब आपकी मेहरबानी होगी मेरी बेटी को ढूंढ दो साहब!!

अबे कहीं रिश्तेदार के या आस-पड़ौस में चली गयी होगी।

नहीं साहब सब रिश्तेदार, आस-पड़ौस के तो घर पर ही थे।

क्या?? घर पर,, क्यों??

कल उसकी शादी थी साहब, वहीं से गायब है।

अबे!! उसे गायब होना नहीं भाग जाना कहते हैं, सीधे-सीधे बोल ना कि तेरी बेटी उसके यार के साथ भाग गयी है।

हवलदार की कटीली बातें शर्मा जी को चुभ गयी,

क्क्क्.. क्या बोल रहे हो साहब, थोड़ा सा तमीज से तो बात करो।

श्यामलाल!!! ये कौन चिल्ला रहा है बाहर ?? (अन्दर से पुलिस ऑफिसर बोला)

कुछ नहीं साहब, एक बूढ़ा अपनी बेटी की रिपोर्ट लिखवाने आया है।

क्या हुआ उसकी बेटी को?

शादी के मंडप से अपने यार के साथ भाग गयी साहब !!

हवलदार की बात सुनकर पूरा थाना जोर-जोर से हँसने लगा और शर्मा जी हाथ जोड़े लज्जित हो अफसर के सामने जा पहुँचे।

साहब मेरी बेटी की गुमसुदगी की रिपोर्ट लिख लो साहब!! क्या पता कल से कहाँ गायब हो गयी है??

कोई फोटो लाये हो उसकी!!

हाँ साहब, ये लिजिये।

अरे श्यामलाल देखना तो लड़की तो वाकई जवान लग रही है भाई।

जी साहब !!

एक बार फिर पूरा थाना हँसी से गूँज उठा और एक बार फिर शर्मा जी ने अपनी आँखें झुका ली।

श्यामलाल इसकी रिपोर्ट लिख लो, और हाँ सब डिटेल में पूछ लेना, कब, कैसे, कहाँ, किसके साथ, क्यों??? कुछ भी छोड़ना मत।

जी साहब!! (मुस्कुराते हुये हवलदार शर्मा को साथ ले, एक तरफ बढ़ गया)

शर्मा जी ने सब कुछ विस्तार से रिपोर्ट में लिखवा दिया और वो पत्र भी उनको दे दिया।

अब 500 रु. दे दो, जैसे ही कुछ पता चलेगा तुम्हें बता देंगें!!

500 रु., साहब मेरे पास तो कुछ नहीं है!!

कुछ नहीं है मतलब, हम यहाँ कोई धर्मशाला खोले बैठे हैं जो मुँह उठाकर चले आये। 500 रु. दो नहीं तो चलते बनो।

पर साहब रिपोर्ट लिखवाने के तो कोई पैसे नहीं लगते ना..

शर्मा जी के इस सामान्य से सवाल ने उनके मुँह पर एक तमाचा जड़वा दिया।

जबान चलाता है.. चल निकल बाहर.. दोबारा इधर दिख गया तो अन्दर कर दूंगा, चल भाग यहाँ से, हमें नियम सिखा रहा है।

अपनी साठ वर्ष की उम्र में ये पहली बार था जब किसी ने शर्मा जी को थप्पड़ मारा था, बेचारे के मुँह से खून आ गया। एक तमाचे ने उनका पूरा जीवन उनके सामने खोल के रख दिया, उन्होंने एक-एक पल याद कर लिया, परन्तु उनको कोई भी ऐसा क्षण याद नहीं आया जब किसी अध्यापक ने या किसी अफसर ने यहाँ तक की उसके माँ-बाप ने भी उसे तमाचा मारा हो।

शर्मा जी रात भर से इतना रोये थे कि अब तो उनकी आँखों से आँसुओं ने भी निकलने से मना कर दिया था, पर आँसुओं की कमी लहू ने पूरी कर दी और थप्पड़ पड़ने पर आँसू की जगह मुँह से लहू निकल पड़ा। शर्मा जी का पूरा गाल लाल हो गया था। घर पहुँचते ही राधा बिलख पड़ी –

हाय राम.. ये क्या हो गया आपको?? .. आपकी ये हालत किसने की??? आपके मुँह से ये खून कैसे निकल रहा है??? हे भगवान् !!!  रुकिये मैं पानी लाती हूँ।

लिजिये कुल्ला कर लिजिये!!

क्या हुआ ये??

जवाब में इस बार शर्मा जी के आँसुओं ने उनका साथ दिया और जोरों से बरस पड़े, शायद आत्मीय शब्दों ने उन्हें बाहर आने पर मजबूर कर दिया था। शर्मा जी के मुँह से शब्दों के स्थान पर आँखों से आँसू बह रहे थे।

राधा ने भी उनका सिर गोद में लेकर बिलखना शुरू कर दिया था।

ये दौर एक से दो घंटे चलता रहा, फिर राधा रसोईघर में गयी और बर्फ लाकर शर्मा जी के गाल पर सेक करने लगी।

सेक करवाते हुये शर्मा जी ने सिसकते हुये थाने में हुआ पूरा घटनाक्रम अपनी पत्नी को सुना दिया, वो भी सिसकती रही और शर्मा जी को ढांढस बंधाती रही, उसके अतिरिक्त और था भी कौन जो उनके जख्मों पर मरहम लगाता, दोनों एक दूसरे को ढांढस बंधाते कभी एक दूसरे से लिपट कर रोने लग जाते। ऐसे ही दोपहर से शाम हो गयी बिना खाये पिये बूढ़ी हड्डियों में इतनी जान भी कहाँ थी सो दोनों को कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। दोनों की नींद सुबह दूध वाले के द्वारा गेट बजाये जाने पर खुली।

राधा दूध ले आयी और चाय चढ़ा दी फिर दोनों ने बुझे-बुझे मन से चाय पी और अपने गम को कम करने की नाकाम कोशिश करते रहे।

रह रहकर दोनों को अपनी बेटी की याद आती और दोनों सिसक पड़ते पर कहीं मेरे रोने से वो ना रो पड़े इसी भय से दोनों में से कोई अपने आँसू बाहर नहीं आने देता। अन्ततः जब आँसू रोके ना रुके तो राधा चाय के कप उठाकर रसोई में चली गयी और बिना आवाज के फूट-फूट कर रोने लगी। उधर शर्मा जी उठकर बाथरूम में चले गये और पानी का नल चला कर बिलखने लगे। काफी देर तक ऐसे ही रोते रहने के बाद शर्मा जी नहा धोकर बाहर आये और तैयार होने लग गये। शर्मा जी को तैयार होते देख राधा पूछ बैठी –

अब कहाँ के लिये तैयार हो गये हो??

कुछ नहीं वो अपने इलाके के नेताजी काफी अच्छे हैं तो उनके पास जा रहा हूँ शायद वो हमारी मदद कर दें।

नहीं..नहीं.. रहने दीजिये आप कहीं नहीं जायेंगें… कल गये थे ना क्या किया उन जालिमों ने?? पहले केवल आत्मा पे जख्म था अब शरीर पर भी बना कर भेज दिया। आपकी इन बूढ़ी हड्डीयों में अब इतनी ताकत नहीं है जो इस उमर में लोगों की मार खाते फिरो, वो भी मेरी कोख के उस कलंक के लिये जो हमें जीते जी मार गयी। नहीं… मैं आपको कहीं नहीं जाने दूंगी..

इतना कहकर राधा शर्मा जी से लिपट कर सिसकने लग गई।

राधे..ऐ राधे.. सुन ना,, तू तो मेरे जीवन के सुख-दुःखों की संगिनी हे रे, मुझे मेरी अन्तिम ईच्छा पूरी करने दे, पता नहीं कब तक हैं,, अब…..

इतना कहकर शर्मा जी ने अपनी पत्नी के आँसू पोंछ दिये और बाहर को चले गये।

आज भी शर्मा जी को केवल ठोकर के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला। नेताजी ने मिलने से साफ मना कर दिया। इसी प्रकार दर-दर भटकते हुये अन्त में शर्मा जी हार गये और उन्होंने भटकना छोड़ दिया। घर में किसी कोने में पड़े वो रो लेते और किसी कोने में पड़ी उनकी पत्नी, बस उन लोगों का यही सिलसिला चलता रहता।

एक दिन एक छात्र प्रेम, जो साहित्य विषय से अध्ययन कर रहा था, वो कहीं से उन लोगों के बारे में सुनकर उनके पास आया और उनसे उनके एवं उनकी बेटी के बारे में पूछा …

जवाब में शर्मा जी ने अपनी बेटी के घर आने से लेकर उसके घर से चले जाने और आज तक की पूरी कहानी उसे सुना दी। प्रेम लिखते-लिखते कई बार अपने आँसू पोंछता रहा। शर्मा जी भी कभी अपनी बेटी की स्मृतियों में हँसते खिलखिलाते और कभी उसके अचानक चले जाने से बिलखने लगते। अन्त में कहानी पूर्ण होने के बाद जब प्रेम चलने लगा तब शर्मा जी अपनी पत्नी को पास में ना देखकर उससे बोले –

सुनो बेटा!! एक मेहरबानी करोगे ???

हाँ.. हाँ.. बोलिये !!

बेटा क्या तुम जो ये लिख कर ले जा रहे हो ये कहीं छपेगा??

हाँ… जरूर छपेगा… आपकी कहानी में इतना दर्द है कि हर कोई इसे पढ़ना और समझना चाहेगा।

तो बेटा एक बात और छूट गई है वो भी लिखोगे क्या??

हाँ.. हाँ.. जरूर पर आपने तब से क्यों नहीं बताई??

तब से मेरी पत्नी यहाँ पर थी और यह बात उसे भी नहीं पता। मैं उसे बताना भी नहीं चाहता।

हाँ..हाँ.. बताईये.. प्रेम फिर अपने थ्ौले से कलम व कागज निकाल लिखने को तैयार हुआ। तभी फिर शर्मा जी बोल पड़े –

पहले वादा करो कि तुम यह बात किसी से नहीं कहोगे।

अरे ऐसा क्यों??? चलिये वादा किया। अब कहिये..

बेटा अब रोज-रोज के तानों से हम लोग परेशान हो गये हैं, मेरा तो कुछ नहीं परन्तु बेचारी राधा का मन उन तानों से बहुत दुःखता है। वो बेचारी मुझे बिना बताये कोनों में छुप-छुपकर रोती रहती है और ये मुझसे देखा नहीं जाता। वैसे भी अब जीवन में ज्यादा दिन बचे नहीं हैं और जो हैं वो नरक के समान ही गुजर रहे हैं तो ऐसे दिन गुजारने से फायदा भी क्या?? इसीलिये आज तुम्हारे आने से लगभग घंटे भर पहले हम दोनों पति-पत्नी ने अपनी अन्तिम चाय पी थी। हम दोनों की चाय में मैंने जहर मिला दिया था। अब हम लोग आसानी से मर सकेंगें और बेचारी राधा के भी सब दुःख दर्द मिट जायेंगें।

क्क्क्क्या ???? जहर…

प्रेम जहर शब्द सुनकर चौंक गया था।

हाँ..बेटा!! पर तुमने वादा किया था तुम किसी को कहोगे नहीं… इसलिये मेहरबानी से हमे अपने जीवन का एक सुख तो भोगने दो.. अब हमें मरने दो….

प्रेम मजबूर था वो रोता हुआ वहाँ से उठ दरवाजे के पास जाकर सुबकने लगा।

शर्मा जी भी उठकर अन्दर अपने कमरे में चले गये थे। राधा भी रसोई से बाहर आयी तो देखा कि शर्मा जी नहीं हैं और प्रेम दरवाजे के पास जाने को तैयार हो रहा है। वो लपक कर उसके पास गयी और बोली –

सुनो बेटा !!!

प्रेम ने अपने आँसू झट से पोंछे और बोला ..

हाँ माँजी बोलिये..

जा रहे हो…

जी हाँ.. मेरा काम हो गया.. मैंने कहानी लिख ली अब मैं चलता हूँ..

बेटा मेरा एक काम करोगे …

जी हाँ बोलिये..

क्या एक लाईन मेरी भी जोड़ दोगे ??… बिना किसी को बताये…

प्रेम बड़े आश्चर्य में था कि अब ये क्या लिखवाना चाहती हैं… फिर भी उसने हाँ कर दी और लिखने बैठ गया …

बेटा तुमने तो देखा ही है ये अपनी बेटी की यादों में कैसे खोये-खोये रहते हैं। बेटी की याद ने इनको पागल बना दिया है। दिन रात तड़पते रहते हैं, कई बार तो सपने में भी उठकर बेटी का नाम पुकारते रहते हैं, इधर इनकी दमा की बिमारी भी बढ़ गयी है, ऊपर से इनका घर से बाहर निकलना बन्द हो गया। जब भी बाहर निकलते हैं तो कहीं ना कहीं से कोई व्यंग्य का बाण इनके ऊपर आ ही पड़ता है। यहाँ तक की अगर ये दरवाजे पर भी बैठते हैं तो कोई ना कोई चलता फिरता भी बदनामी का दाग याद दिला जाता है। बेचारे रोज सुबकते रहते हैं, कभी इस कोने में कभी उस कोने में, मैंने इनके साथ जिन्दगी के 35 वर्ष बिता दिये परन्तु कभी इन्हें इतना पीड़ित व दुःखी नहीं देखा। अब इतने दिनों से इनका दुःख देख रहीं हूँ पर अब नहीं देखा जाता। इसलिये आज तुम्हारे आने से पहले मैंने हम लोगों के लिये चाय बनायी थी, उसमें मैंने जहर मिला दिया था। अब साथ मैं मरेंगें शायद हमारे पापों का यही दण्ड है।

क्या?????

राधा की बात सुनकर प्रेम के आँसूओं ने तो जैसे उसकी मानना ही छोड़ दिया और जोरों से बरस पड़े, प्रेम एक पल भी वहाँ रुके बिना वहाँ से चला गया।

दूसरे दिन के अखबार में शर्मा जी व उनकी पत्नी की एक-दूसरे के गले में हाथ डाले सोये हुओं की तस्वीर आयी साथ में लिखा था दोनों ने बेटी के गम में आत्महत्या कर ली।

प्रेम सीधा शर्मा जी के घर गया तो पता चला उनके शव को अस्पताल पोस्टमार्टम के लिये ले गये हैं उसके उपरान्त लावारिस लाशों के साथ जला दिया जायेगा। अस्पताल पहुँचकर प्रेम ने शव को लेने के लिये प्रार्थना पत्र दिया और रिश्ते में अपने आप को उनका मुँह बोला बेटा बताया।

उनका शव लेकर उनका विधि पूर्वक दाह संस्कार किया एवं तदनन्तर हिन्दू रिवाजों के अनुसार पूर्ण क्रिया कर्म सम्पूर्ण करवाया।

समय अपनी गति से चलता रहता है। इसलिये इस बात को लगभग 15 वर्ष गुजर गये थे और अब संस्कृति के 14 वर्ष की बेटी भी है। संस्कृति अपने पति के साथ सुखपूर्वक जीवन बिता रही है। संस्कृति की बेटी दीक्षा कक्षा दस की छात्रा है। एक दिन मातृ दिवस पर आयोजित हुये कार्यक्रम में दीक्षा माँ विषय पर एक गीत प्रस्तुत करती है और उसे पुरस्कार स्वरूप एक प्रतिभावान लेखक ‘प्रेम’ की सुप्रसिद्ध कृति ‘शादी का बजट’ मिलती है। घर जाकर उसने पुरस्कार के बारे में उसकी माँ को बताया व वो पुस्तक अपनी माँ को देते हुये बोली –

मम्मी मैंने अपनी माँ पर गीत सुनाया इसीलिये मुझे ये पुरस्कार मिला, अतः इसकी हकदार आप हैं तो ये आप रखिये, आप इसे पढ़ियेगा एवं इससे जो भी सीखने को मिले वो मुझे भी सिखाना।

दूसरे दिन सुबह ही दीक्षा फिर पूछ बैठी मम्मी क्या आपने वो पुस्तक पढ़ी??

नहीं बेटा अभी नहीं..

तो कब पढ़ोगी मम्मी?? टीचर कह रही थी वो बहुत ही अच्छी पुस्तक है।

आज दिन में पढूंगी बेटा।

ओके मम्मी, फिर शाम को मैं आपसे पूछूंगी कि उसमें क्या लिखा है।

इतना कहकर दीक्षा विघालय चली गई।

पुस्तक के बारे में कई बार समाचार पत्रों व टेलीविजन पर भी आ चुका था, अतः जिज्ञासावश संस्कृति ने उस पुस्तक को पढ़ना शुरू किया।

जैसे-जैसे वो पुस्तक को पढ़ती जाती उसे अपना बचपन याद आता जाता। आकर्षणवश वो पुस्तक को छोड़ ही नहीं पा रही थी। तभी पुस्तक में उसका सामना उस सुखद घटना से हुआ जो उसके द्वारा दुःखद घटना बन गई। उसके अनन्तर उसके माता-पिता की हालत, उनकी बेईज्जती और अन्त में एक-दूसरे को जहर देकर मारने वाली बात ने उसका पूरा आंचल आँसुओं से भिगो दिया।

वो अपने आपको घंटों तक कोसती रही और पूछती रही इस सुखी जीवन का मतलब क्या है। मुझे जीवन देने वालों को मैंने ऐसे कांटों में ढकेल दिया, यहाँ तक कि उनके प्राण भी ले लिये तो मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं है। मेरी जैसी बेटी का पैदा होते ही गला घोंट देना चाहिये। शायद लोग मेरी जैसी बेटी की वजह से ही अपनी नन्हीं अबोध बच्चियों के प्राण ले लेते हैं। भले ही वो गलत करते हैं पर यदि बेटी मेरी जैसी हो तो उनका करना गलत नहीं होता है। पाप है पर, इससे भी बढ़कर पाप तो मैंने किया है। हे भगवान् मैं क्या मुँह दिखाऊंगी अपने माँ-बाप को??

संस्कृति ऐसे ही बिलख रही थी तभी उसकी बेटी ने उसे आवाज दे दी।

मम्मी!! मैं आ गई।

संस्कृति अपने आँसू पोंछते हुये अपनी बेटी के पास गई और उसे गले लगा लिया।

पता है मम्मी आज हमारी स्कूल मैं कौन आये थे??

कौन आये थे??

प्रेम सर आये थे, जिन्होंने वो किताब लिखी है।

अच्छा…

हाँ… उन्होंने सब बच्चों से पूछा कि वो बड़े होकर क्या बनना चाहेंगें… तो किसी ने कहा.. डॉक्टर.. किसी ने कहा.. पुलिस… पर पता है मैंने क्या कहा??

क्या कहा मेरी रानी बेटी ने???

मैंने कहा कि मैं तो मेरी मम्मी जैसी बनूंगी।

नहीं…. दीक्षा की इतनी बात सुनते ही संस्कृति ने उसका मुँह हाथ से बन्द कर दिया और जोर-जोर से रोने लगी। उसे अपने कर्मों कि इससे बड़ी सजा और क्या मिलती कि वो अपनी बेटी को ये भी नहीं कह सकती थी कि वो उसकी तरह बने… उसके अब बहने वाले आँसू पश्चाताप के आँसू थे.. पर क्या इन आँसुओं से उसके द्वारा किया गया घोर पाप मिट जायेगा…

अन्त में उसके बहते आँसूओं में वह केवल एक सुनहरी याद ही याद रख पायी और वो थी उसकी ‘शादी का बजट’ जिसमें वो अपने माता-पिता के गले लग कर रोयी थी और उनकी चिन्ता की घड़ियों में सरीक हुई थी।

© संजय कुमार शर्मा ‘प्रेम’

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