भारत माता ( श्याम सवैया छंद—छ पंक्तियाँ ) 
    
भाल रचे कंकुम केसर, निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाए।
राष्ट्र के गीत बसें मन में,उर राष्ट्र के गान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पांव सदा,नैनों में विशाल गगन लहराये।
गंगा जमुना शुचि नदियों ने,मणि मुक्ताहार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश सदा, हरियाली जिसके मन भाये।
भारत मां शुभ्र ज्योत्सिनामय,सब जग के मन को हरषाये॥

 

      हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन भाया  
      उगता जब रवि इस आंगन में,लगता है सोना बरसाया  
      मरुभूमि सुन्दरवन से सजी, दो सुन्दर बांहों युत काया  
      वो पुरुषपुरातन विन्ध्याचल,कटिमेखला बना हरषाया  
      कणकण में शूरवीर बसते,नसनस में शौर्य भाव छाया  
      हर तृण ने इसकी हवाओं के,शूरों का परचम लहराया

इस ओर उठाये आंख कोई,वह शीश फ़िर उठपाता है
वह द्रष्टि फ़िर से देख सके,इस पर जो द्रष्टि गढाता है
यह भारत प्रेमपुजारी है, जगहित ही इसे सुहाता है
हम विश्वशान्ति हित के नायक,यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञानध्वजा,नितनित फ़हराता जाता है।।

 

इतिहास बसे अनुभवसंबल,मेधाबल,वेदरिचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे,चलदिया आज नवराहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर,विज्ञान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण,फ़ैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें,इसकी नव कलाकथाओं में।
ललचाते देव मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में

 

 

 

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