हम गुम हो रहे हैं धीरे धीरे

हम गुम हो रहे हैं धीरे धीरे
रोज मर रहे हैं धीरे धीरे

दांत गिरे, बाल झड़े, आँखो पर चश्मे चढ़े
नहीं हो पाते सीधे खड़े, दिल जंवा पर अंदर छल्ले डले

खुशिओं और गमो में  जिंदगी काटी
गमो को छुपा कर, खुशियां बांटी

जिंदगी से ना कोई रंज, ना कोई  शिकायत की
बस तमन्ना है फिर से बचपन और जवानी जीने की

पर एक दिन तो सब को है जाना
नहीं चलता यमराज से कोई बहाना

मेरे जाने पर आंसू ना बहाना
बस मेरे कविता और गीत गाना
(संजीव कुमार बर्मन)

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