संस्कारों की जड़ों ,
पर खड़ा जीवन का पेड़
सपनो को सजाये ,
अपने पैरों पर खड़ा
पानी ,खत से जीवन निर्वाह ,
वसुंधरा पर अपनी छाप छोड़े
टहनियों पर पत्तो की सजावट
अपनी शाखों को फैलाता
कड़ी धुप में छाँव देता
वर्षा से लड़ता रहता
अडिग ज़मीन पर जमा रहता
आँधी, तूफानों से टकराता
बूढ़ा पेड़ और सूखी शाखें
चूले डाल लोग इनको फांके
मिट जाते हैं औरों के लिए यह
निशान अपने छोड़ जाते हैं |

लेखक – कल्पना भट्ट

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