मन का आंगन

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मन का आंगन

By |2017-08-16T14:01:01+00:00August 10th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

मन का आंगन था बहुत छोटा,
जिसमें रहते थे अनेकों भाव।
भाव व्यक्त करना सहज नहीं,
असहज है लोगों को समझना।

सहज तो वे लोग हैं आज,
जिन्हें भूखे पेट मरना पड़ता।
मजबूरी में जूता भी मिलता,
सहज लोग उसे सह लेता।

सोचता हूँ जब उस आंगन को,
बचपन की याद आ जाती है।
मेले जाते वक्त शर्त लगवाता,
नाकाम शर्त अभी भी अधूरे हैं।

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हिन्दी,भोजपुरी कविता

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