तपस्या

उसके जीवन की तरह ही एक शाम ऒर ढलने को आई थी । सुबह से बिटिया के इंतजार में बैठी साठ वर्षीय कमला का हर त्यौहार प्रायः अनमना ही बीतता था। लगता था जैसे उधार की खुशियां भी उसके नसीब का मख़ौल उड़ाने का कोई मौका नही छोड़ती।

सात बजने को आए थे। घड़ी की टिक टिक के साथ ही उसके दिल की धड़कन भी बढ रही थी । अपने को संयत कर कमला उठी और बत्ती जलाकर पलंग पर लेट गई ।

अकुलाहट ने उसे विचारों के भंवर में उलझा दिया। वह सोचने लगी – वे दिन भी क्या दिन थे । अपने छोटे परिवार में सबकी लाड़ली बनकर सुख सुविधाओं में जीती थी । उसकी हर उचित अनुचित मांग पल में पूरी हो जाया करती थी । देखते ही देखते वह कब बड़ी हो गई पता ही नही चला। शादी की बातें होती तो कमला साफ मना कर देती । सत्रह – अठारह में शादी के उस समय के चलन को वह उचित नही मानती थी। इससे बचने का उसे एक ही तरीका नजर आ रहा था ,- वह था अपनी पढ़ाई जारी रखना । जिद्द करके कमला ने कॉलेज में प्रवेश ले लिया । बस यहीं से उसकी जिंदगी में बदलाव की बयार बहने लगी । सुंदर तो वह थी ही । साल के बीतते – बीतते प्रेम जाल में उलझ गई।  इस उम्र में शादी न करने के अपने विचार का भी परित्याग कर दिया था और परिजनों की मर्जी को धता बत्ताते हुए कमला ने प्रेम विवाह कर लिया ।

कुछ दिन मौज – मस्ती में बीतने के बाद जब धरातल पर लौटी तो पैरों के नीचे की जमीन खिसकती नजर आई । सबसे अलग – थलग हो अपने शराबी पति को सम्हालना उसे तकलीफ देने लगा । अपने गलत निर्णय के लिए वह बार बार पछताती मगर अब जीवन तो यही जीना था, सो पति को ही समझाती पर लाख जतन के बाद भी वे सुधरे तो नहीं , कमला को भरी जवानी में मझधार में अकेला छोड़ सिधार गए ।

अब आर्थिक संकटों के बीच बड़ी हो रही अपनी  बेटी का लालन पालन भी कमला की ही जिम्मेदारी बन गया । उसे लगने लगा था विपरीत परिस्थितियों में जीवन जीना भी किसी कठिन साधना से कम नही है।अपने स्त्रीत्व की रक्षा करते हुए वैधव्य का जीवन जीना सिर्फ चुनोती ही नही वास्तविक साधना है ।

कई बार मन में उठती हताशा को हराकर अंततः उसने संघर्ष की राह अपनाई और अपनी लगन एवं मेहनत के बल पर पुनः सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित की । अच्छे घर में बेटी का विवाह कर दिया और इस एकाकी जीवन की साँझ तक आ गई।

यही सब सोचते – सोचते कमला की आँख न जाने कब लग गई थी । दरवाजे के खुलने की आहट के साथ ही ..नानी …नानी की आवाज ने कमला का इंतजार खत्म किया । उसकी बेटी और नाती उसके सामने थे। एक – दो दिन के लिए ही सही बच्चों की यह आवाजाही ही उसके एकाकी जीवन की साधना के फल थे।

– देवेंन्द्र सोनी, इटारसी।

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