आजादी का जश्न
आजादी का जश्न
मनाने से पहले

बचा लेना अनगिनत साँसें

नदीकी धार में बहते हुए

सिटी स्मार्ट बनाने से पहले

बचा लेना

हर गाँव को

फसल उगेंगे कहाँ और खाएँगे क्या

क्यूँकि स्मार्ट शहर में भूखे-नंगे

किसान तो न होंगे

न उनकी पसीने की बूँदें जो

लाती है हरयाली मिट्टी में और उग आते हैं सोने

हईटेक जिंदगी की हाईटेक

रोशनी में नहाने से पहले

बाँध लेना गुस्साई नदियों के पाँव

जो कहर बरपा रही हैं

गाँव के गाँव

लील रही हैं जानें

वो जानें जिसमें

तुम्हारे होने की पहचान भी है और

तुम्हारे पुरखों की कंकालें जो दफन हैं

उसी मिट्टी में कहीं

क्यूँकि न होंगे अवशेष अपनों के

तो तुम्हारा वजूद भी नहीं

मैं भी तो दफना आया था

अपने माता-पिता को

उसी गाँव की उसी नदी किनारे

बचा लेना उस मिट्टी को और उनकी

स्मृति कलश

वो पुकारते होंगे तुम्हें कहीं…

—–सुधा मिश्रा

 

 

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