बेरोजगार सोमेन

सोमेन के पिता रमेश साह मिल में ही काम करके सोमेन और श्याम की पढ़ाई कराए। पिताजी का कोई नशा नहीं था। वे बाहर भी कभी कुछ खरीदकर नहीं खाते । कुछ खरीदते भी तो घर ले आते। उनका मानना था कि घर पे सब लोग एक साथ खाने से आपस में प्रेम और भाईचारा बढ़ता है ।
पिताजी की ये खासीयतें सोमेन को बड़ा अच्छा लगता और वह भी अपने पिताजी के तरह आदर्श बेटा बनना चाहता था । हाँ उनकी आदत थी चाय पीने की जो सोमेन को भी जकड़ लिया था । सोमेन के पिताजी इन्टर में ही उसकी नौकरी मील में साहेब के लिए लगा रहे थे पर उस समय वह पढ़ना चाहता था । फिर मोहल्ले के सबसे चर्चीत गुलाब राय जो पार्टी पॉलिटिक्स में रहता वो भी सोमेन से मिलने आया और नौकरी दिलाने का वादा किया परन्तु 5 लाख के मोटे रूपयों से हाथ सेकने पड़ते। यह बात जब उसके पिताजी को मालूम हुआ तो उसके पिताजी तैयार हो गए परन्तु सब कुछ डिपेन्ड था सोमेन के ऊपर और सोमेन को मालूम था कि अगर उसने वह फिरौती देने के लिए हाँ भी कर दी तो पिताजी तो अभी कर्ज में हैं ही जो कुछ बचा है उसे भी बेचनी पड़ जाए फिर नौकरी मिलेगा यह भी तो निश्चित नहीं । हालांकि सोमेन इस तरह के कई ऑफर ठुकरा चुका था ।
हाल-फिल्हाल में ही उसकी बहन रिया की सादी हुई थी जिससे उसके पिताजी के सिर पर कर्जे का बोझ चढ़ा हुआ था। माँ को राहत थी कि चलो किसी तरह बेटी की शादी हो गई अब बेटा की चिन्ता रह गई वो भी नौकरी करने लगे तो हाथ पिले कर दूँ ।
सोमेन मध्यवर्गीय परिवार का नेक लड़का था। उसने कभी चोरी-चमारी , छल-कपट करना नही सीखा था । परन्तु उसके उम्र के लड़के इन सब चीजों में माहिर थे । सोमेन को किताबों से लगाव था । वह प्रत्येक साल पुस्तक मेला जाता था । भले ही वह आर्थिक विषमता के कारण पुस्तक एक या दो ही खरीदता । पर जैसे साहित्य की दुनिया से उसका पुराना रिश्ता हो, वह साहित्य जगत में रम जाना चाहता था । उसे लिखने का शौक था । समाज में चल रहे विद्वेषिता को देखकर दंग रह जाता । सफेद झूठ बोलने वालो के जत्थो के बीच खुद को तन्हा महसूस करता और उसकी यह भड़ास निकलती उसकी कविता में । कभी-कभी तो कविता के कटघरे में खुद को ही खड़ा कर देता ।
कलकत्ता से 40 किलोमिटर दूर नैहटी का ग्वाला फाटक का रहने वाला सोमेन जहाँ एक दिन की ट्रेन की यात्रा करना पड़े तो लोग आ कर बिस्तर पकड़ लेते हैं वहीं अगर उसने चाह लिया और उसे एक दिन में दो बार ट्रेन की यात्रा करनी पड़े तो वह उससे पिछे नहीं हटता बशर्ते कार्य उसके मुताबिक अर्थात् साहित्य से जुड़ा हो ।
उसका पालन-पोषण मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था । वह अपने पिताजी का आदर्श बेटा बनना चाहता था । और समय के साथ-साथ चलना चाहता था परन्तु उसकी किस्मत उसका साथ नहीं देती और फिर भी उसके पिताजी उसके हिम्मत को खोने नहीं देते।
सोमेन लगभग 30 वर्ष का हो चुका था । वह अभी तक कई जगह पर इन्टरव्यूह दे चुका था परन्तु स्पोकेन न होने की वजह से उसका सेलेक्सन नहीं हो पाता था । उसने कई सारे नौकरी मिले भी परन्तु सारे के सारे दूसरो को धोखा देकर अपनी जेबे भरने वाले। शुरू में सोमेन पैसा देकर वो नौकरी ज्वाइन कर लेता परन्तु जैसे ही उसे इस दलदल के बारे में पता चलता है , वह नौकरी छोड़ देता है और अंत में ठगा का ठगा रह जाता है। क्योंकि धोखा देना और झूठ बोलना उसे आता नहीं । ठगना उसने कभी सिखा नहीं । उसे उसके कई दोस्त ने इस मुद्दे पर बात की कि अपना रवैया बदल आज तु जैसे जीना चाहता है वैसी आज की दुनिया नहीं है। आजकल लोग जो तरक्की कर रहे हैं तुम्हें क्या लगता है अपनी मेहनत और संघर्ष से कर रहे हैं? नहीं! उसने किसी के हाथ गर्म किए होंगे और तुम तो आगे समझदार हो। उसकी खुद्दारी उसको भीतर ही भीतर कचोटती । कभी –कभी तो वह खुद से ही प्रश्न करने लगता सोमेन तु ही बता वो तेरा दोस्त मोहन जिसे भारत के प्रधानमंत्री का नाम तक पता नहीं आज रेलवे में नौकरी कर रहा है। अपना रमेश को ही देखले जो तुमसे पुछकर लिखता था, लड़कियों के पीछे पागल रहता था। एक परीक्षा बीना चिट के नहीं लिख पाता था । आज वही सरस्वती विद्यालय का शिक्षक बना हुआ है और तुमने क्या किया अभी तक नौकरी की तलाश ……?
करते रहो………!! अब सरकारी नौकरी तो मिलने से रही कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता । काम काम होता है । शुरुआत तो कर । जो मिले वो कर । जैसा मिले वैसा कर, ठगने को मिले ठग, लेकिन पैसा कमा । क्योंकि आज के दौर में लोग ये नहीं देखते कि तुम पैसा कहाँ से लाए हो या क्या कर के लाए बस ये देखते हैं कि तुम्हासे पास पैसा है और ये गाना तो तुमने सुना ही है “बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रूपैया ! ”
लेकिन एक तरफ उसका मन ये सब नहीं मानता । वह सच्चाई के रास्ते पर ही चलना चाहता भले ही वह भूखे मरे लेकिन झूठ का एक नेवाला उससे घोटा नहीं जा सकता । वह समय को देखकर अपनी ईमानदारी बेचना नही जानता। वह अपने मकसद में दृढ़ होना चाहता है। वह समाज में हो रहे दुराचार को दूर करना चाहता है। उसके साथ जो हो रहा उस राह के मुसाफिर को सही राह दिखाना चाहता है । मन के इस अंर्तद्वंद्व में वह पिसता ही रहता ।
सोमेन कभी अपने पिताजी के जुबान से सुना था कि पहले माध्यमिक पास होने से नौकरी देने के लिए साहेब लोग घर पर आते थे। और सोमेन तो ग्रेजुएट पास था । प्रतिदिन बढ़ती मंहगाई और जनसंख्या वृद्धि ने बेरोजगारी की दर को सौ गुणा बढ़ा दिया है । आज के दौर का स्लोगन ही हैं “पैसा ,पावर और पॉलिटिक्स ” परन्तु कुछ हद तक ये भी बदल चुकी है क्योंकि आज कल देखा जा रहा है सभी की सभी चीजे पैसों में ही आत्मकेंद्रित हो गई है । क्योंकि अगर आपके पास पैसा है तो पॉलिटिक्स में आप जब चाहे आ सकते हो और जिसे चाहे खरीद सकते हो ।
आजकल ट्रेन समय पर नहीं चलती परन्तु सोमेन का किस्मत इतना खराब कि इन्टरव्यूह में जाने के लिए घर से निकलते-निकलते ही लेट हो गई और उसी दिन ट्रेन अपने समय से चल पड़ी । सोमेन ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ा परन्तु ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी । लोग अगले ट्रेन का इंतजार करने लगे थे । सोमेन भी प्लेटफार्म पर बैठ गया । उसने नौकरी के लिए नौकरी के साइट पर कई आवेदन डाल दिए थे । जहाँ से उसको कई बार कॉल आते परन्तु इस चक्कर में वह कई बार ठगा जा चुका था । ये भी बात सच ही साबित होती है कि बेरोजगारी में युवक ज्यादा ठगे जाते हैं। कई जगह उसने कॉल किया पर सब जगह पहले रजिस्ट्रेशन कराने के लिए 2000, 1000 तो 500 रू तो कम से कम लगते ही हैं। कई बार तो फोन पर ही टेलिफोनिक साक्षात्कार के बाद सेक्युरिटी मनी के तौर पर 2000 से 3000 रू. मांगे जाते । इन सब कॉल से वह तंग आ चुका था ।

नौकरी के लिए दर-ब-दर भटकता सोमेन को जहाँ भी बुलाया जाता वह वहाँ पर इसलिए चला जाता कि कहीं कोई प्राईवेट ही अच्छी नौकरी मिल जाए ।

परेशान सोमेन आज भी नौकरी की तलाश में भटक रहा है। नौकरी उसे नहीं मिलती क्योंकि वह अपने आदर्शो से समझौता करना नहीं चाहता ।

इस तरह के कई सोमेन दुनिया में हर जगह बेरोजगारी का शिकार हो रहे हैं अपनी सच्चाई का, अपनी खुद्दारी का और अपने नेक नियत का

संतोष कुमार वर्मा  “कविराज “

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