मन व्यग्रता

एक धुआं धुआं उठता
मेरा मन व्यग्र सा हो जाता
कवि मन के अंदर जो
मुझसे छुपता और मचलता
अब सहज नहीं राहें
मन मुझसे कहता है
यहां कोई नहीं अपना
सब बेगाने लगते हैं
कोई लगता नहीं अपना
राहों में कांटे बिखरे हैं
मुझे मंजिल नहीं मिलती
मन को चैन मिल जाए
कोई रास्ता तो देखो
अब सहा नहीं जाता
एक आग में जलता है
गंगाजल से भिगो दो मन
थोड़ा शीतल हो जाए
मन पर चंदन लगाओ तो
थोड़ी खूशबू हो जाए
एक धुआं धुआं उठता
मेरा मन व्यग्र सा हो जाता

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