मन व्यग्रता

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मन व्यग्रता

By |2017-08-17T12:52:19+00:00August 17th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

एक धुआं धुआं उठता
मेरा मन व्यग्र सा हो जाता
कवि मन के अंदर जो
मुझसे छुपता और मचलता
अब सहज नहीं राहें
मन मुझसे कहता है
यहां कोई नहीं अपना
सब बेगाने लगते हैं
कोई लगता नहीं अपना
राहों में कांटे बिखरे हैं
मुझे मंजिल नहीं मिलती
मन को चैन मिल जाए
कोई रास्ता तो देखो
अब सहा नहीं जाता
एक आग में जलता है
गंगाजल से भिगो दो मन
थोड़ा शीतल हो जाए
मन पर चंदन लगाओ तो
थोड़ी खूशबू हो जाए
एक धुआं धुआं उठता
मेरा मन व्यग्र सा हो जाता

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