लम्बी है डगर

नीरजा शर्मा
चल रही है जिन्दगी लम्बी है डगर
मन की पीड़ा है हम कहें भी कहा
पूछती है डगर जा रही हो कहां
सुन री डगर क्या कहूँ मैं तुझे

क्या बताऊँ खुद नहीं है खबर
राह पर चलती रही सुझता नही
शायद कोई मिल जाए राह पर
चल रही जिन्दगी लम्बी है डगर

अपनों को ढुढें कहां पहचान नहीं
गैरों के बीच मिल जाए कोई
जाने कब से भटक यूहीं रही
चल रही जिन्दगी लम्बी है डगर

चांद तू भी अब बुड्ढा हो है चला
सदियों से तुझे देखती आ रही
बातें बनानी भी तू भूल गया
चल रही है जिन्दगी लम्बी है डगर

रूखसार से सजर ही है भली
इनायत तेरी अब नहीं चाहिए
राह भी मिली रूह में धूल भरी
चल रही है जिन्दगी लम्बी है डगर

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