ढोल की पोल

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ढोल की पोल

By |2018-01-20T17:07:51+00:00November 12th, 2015|Categories: पंचतन्त्र|Tags: , |0 Comments

एक बार गोमायु नाम का एक गीदड़ भूखा-प्यासा जंगल में घूम रहा था | घूमते-घूमते वह एक युद्ध भूमि में पहुँच गया | वहां दो सेनाओं के बीच युद्ध होकर समाप्त हो गया था, लेकिन एक ढोल अभी तक वहीँ पड़ा था | उस ढोल पर इधर-उधर की बेलों की शाखाएं हवा में हिलती हुई प्रहार करती थी | उन प्रहारों से ढोल बड़े जोर की आवाज होती थी |

इस आवाज को सुनकर गोमायु बहुत भयभीत हो गया | उसने विचार किया कि इससे पहले यह भयानक शब्द वाला जानवर मुझे देखे, मैं यहाँ से भाग जाता हूँ, लेकिन दुसरे ही क्षण उसे याद आया कि भय आनदं के उद्वेग में हमें सहसा कोई काम नहीं करना चाहिए | पहले भय के कारण की खोज करनी चाहिए | यह विचार कर वह धीरे-धीरे उधर चल पड़ा, जिधर से ढोल की आवाज आ रही थी | जब वह वहा पहुंचा तो ढोल को देखा | ढोल पर बेलों की शाखाएं चोटकर रही थी | उसने स्वयं भी उस पर हाथ मरने शुरू कर दिए | ढोल और भी तेज बज उठा |

गोमायु ने सोचा, यह जानवर तो बहुत  सीधा-साधा मालूम होता है | इसका शारीर भी बहुत बड़ा है | मांसल भी है | इसे खाने से कई दिनों की भूख मिट जाएगी | इसमें चर्बी, मांस, रक्त खूब होगा | यह सोचकर उसने ढोल के ऊपर लगे हुए चमड़े में दांत

गड़ा दिए, चमड़ा बहुत कठोर था, गीदड़ के दोनों दांत टूट गए | बड़ी मुश्किल से ढोल में छिद्र हुआ | उस छिद्र को चौड़ा करके गोमायु गीदड़ जब ढोल के अन्दर  घुसा, तो यह देखकर वह बहुत निराश हुआ की वह अन्दर से बिलकुल झाली है, उसमें रक्त, मांस, मज्जा थे ही नहीं |

यह कथा सुनाकर दमनक बोला- “ महाराज, इसलिए मैं कहता हूँ की शब्द मात्र से डरना उचित नहीं है |”

पिंगलक ने कहा- “ मेरे सभी अनुयायी उस आवाज से सर्कार जंगल से भागने की योजना बना रहे हैं | इन्हें किस तरह धीरज बंधाऊँ ?

दमनक ने कहा- “ इसमें इन बेचारों का क्या दोष ? सेवक तो स्वामी का ही अनुसरण करते हैं | जैसा स्वामी होगा, वैसे ही उसके सेवक होंगे | यही संसार की रीती है आप कुछ  काल धीरज रखें, साहस ने काम लें, मैं शीघ्र ही उस शब्द का स्वरुप देखकर आऊंगा |”

पिंगलक ने पूछा- “तू वहां जाने का साहस कैसे करेगा ?”

दमनक बोला- “ स्वामी के आदेश का पालन करना ही सेवक का काम है | स्वामी की आज्ञा हो तो आग में कूद पडूँ, समुन्द्र में छलांग मार दूँ |”

पिंगलक ने कहा- “ यदि ऐसी बात है तो जाओ | तुम्हारा मार्ग कल्याणकारी हो, यही मेरा आशीर्वाद है |

दमनक पिंगलक को प्रणाम करके शब्द की दिशा की ओर चल पड़ा | उसके जाने के बाद पिंगलक ने सोचा, यह बात अच्छी न हुई कि मैंने दमनक का विश्वास करके उसके सामने अपने मन का भेद खोल दिया | कहीं वह उसका लाभ उठाकर दुसरे पक्ष में मिल जाये और उसे मुझ पर आक्रमण करने के लिए उकसा दे तो बुरा होगा | मुझे दमनक पर भरोसा नहीं करना चाहिए था | वह पदच्युत है, उसका पिता मेरा प्रधानमंत्री था | एक बार सम्मानित होकर हुए सेवक विश्वासपात्र नहीं होते | वे सदा अपने इस अपमान का बदला लेने का अवसर खोजते रहते हैं | इसलिए किसी दूसरे स्थान पर जाकर ही दमनक की प्रतीक्षा करता हूँ | यह सोचकर वह वहां से उठकर दुसरे स्थान पर चला गया और दमनक के लौटने का इंतजार करने लगा |

उधर दमनक जब संजीवक के पास पहुंचा तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा | डरकर पिंगलक के प्राण सूखे जा रहे थे, वह तो केवल बैल था | दमनक इस स्थिति में लाभ उठाने की सोचने लगा | ऊपर से मित्रता और अन्दर से द्वेष, दोनों के बल पसर पिंगलक को अपने वश में लिया जा सकता है, यह सोचकर वह संजीवक से मिले बिना ही वापस लौट गया |

पिंगलक ने जब दमनक को अकेले आते देखा तो उसकी जान में जान आई | उसने अपने अनुयायियों को बुला लिया और पहले की तरह व्यूह बना कर बैठ गया | दमनक उसके समीप पहुंचा और उसको प्रणाम कर एक ओर बैठ गया | पिंगलक ने उत्सुकता से उसे पूछा- “ दमनक, देख आए उस प्राणी को ?”

दमनक बोला- “ हाँ महाराज, आपकी कृपा से उसे देख आया हूँ | “

पिंगलक ने पूछा- “कैसा है वह ? “

दमनक बोला- “ महाराज, वह बहुत ही बलवान जीव है | आप तो उसके आगे कुछ भी नहीं हैं | फिर भी उसने मुझसे कुछ नहीं कहा |”

यह सुनकर पिंगलक बोला- “ दमनक, सामर्थ्यवान लोग दीनजनों से कुछ नहीं कहते | उनकी दिलचस्पी तो बराबर के लोगों से टक्कर लेने में होती है | खैर, अब यह बताओ की क्या वह हमसे मिलने को यहाँ आ सकता है ?”

दमनक बोला- “ क्यों नहीं आएगा, स्वामी ? वह जरुर आएगा | मैं उसे यहाँ ला सकता हूँ |”

पिंगलक ने आश्चर्य चकित होकर पूछा- “ क्या तुम सचमुच उसे यहाँ ला सकते हो ?”

दमनक बोला- “हाँ स्वामी, हाँ! आपको शायद अभी भी मेरी बुद्धिमता पर संदेह है, लेकिन मैं दावे के साथ कहता हूँ की मैं उसे यहाँ ले आऊंगा और वह भी आपके एक सेवक के रूप में बूढी के बल पर क्या कुछ सिद्ध नहीं किया जा सकता ?”

तब पिंगलक ने कहा- “यदि ऐसी बात है तो आज ही से मैं तुमको अपना मंत्री बनता हूँ |”

यह सुनकर दमनक का सीना गर्व से फूल गया | वह तुरंत वहां से उठकर संजीवक के पास चल दिया और संजीवक के पास पहुँच कर बड़े गर्व से बोला- “ अरे ओ दुष्ट बैल, इधर आ | मेरे स्वामी पिंगलक तुम्हें बुला रहे हैं | इस प्रकार निशंश्क होकर डकराने का तुम्हें साहस कैसे हुआ ?”

संजीवक ने पूछा- “ यह पिंगलक कौन है ?”

दमनक अकड़ कर बोला- “ आश्चर्य की बात है, तुम हमारे स्वामी सिंघराज पिंगलक को नहीं जानते | वह इस जंगल के राजा हैं, और मैं हूँ उनका मंत्री | अब चुपचाप मेरे साथ चलो | मेरे स्वामी यहाँ से कुछ दूर एक बरगद के वृक्ष के निचे अपने सहायकों के साथ बैठे हुए हैं |”

यह सुनकर संजीवक के प्राण- “मित्र! तुम सज्जन प्रतीत होते हो | यदि तुम मुझे वहां ले जाना चाहते हो, तो पहले स्वामी से मेरे अभय-दान दिलवालों तो मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ |”

दमनक बोला- “बात तो ठीक कही है तुमने | अच्छा तो मैं अभी अपने स्वामी से पूछ कर आता हूँ |

यह कहकर दमनक पिंगलक के पास गया और बोला- “महाराज! वह बैल साधारण नहीं है | वह भगवान शंकर का वाहन है | मेरे पूछने पर उसने बताया है की भगवान शंकर की आज्ञा से वह यमुना तट पार हरी घास चरता है और इस जंगल में विचरण करता है |”

पिंगलक समझ गया की तभी वह इस बीहड़ वन में बिना किसी भय के निर्द्वद भाव से विचरण कर रहा है | उसने पूछ लिया- “तब तुमने क्या कहा दमनक ?”

दमनक बोला- “ मैंने उसको कहा की यह वन तो भगवती चंडिका के वाहन मेरे स्वामी सिंघराज पिंगलक को माँ भगवती ने प्रदान किया है | उनकी आज्ञा के बिना इस वन से कोई एक तिनका भी नहीं तोड़ सकता | मैंने उसको आपके सम्मुख चलने को कहा तो उसने कहा की पहले उसे अभयदान दिया | लेकिन, उससे मुझे भी अभयदान दिला कार उसे मेरे पास ले आओ |”

अपनी चतुराई पर मन ही मन प्रसन्न होता हुआ दमनक संजीवक के पास पहुंचा और बोला “ मित्र! मेरे स्वामी ने तुम्हें अभयदान दे दिया है | अब तुम निर्भय होकर मेरे साथ चलो | लेकिन याद रहे, राजा की निकटता और कृपा पाने के बाद मेरे साथ समय के अनुसार ही व्यवहार करना | कहीं घमंड में आकार मनचाहा आचरण न कर बैठना | मैं भी आपके इशारे पर राज्य का मंत्रिपद  प्राप्त करूँगा | ऐसा करने से हम दोनों को राज्य लक्ष्मी का लाभ होगा | जो व्यक्ति घमंड के कारण उत्तम, मध्यम और उधम का सम्मान नहीं करते, राजा का सम्मान पाने के बाद भी दंतिल की तरह पतन को प्राप्त होते हैं |”

संजीवक ने पूछा- “ वह कैसे मित्र ?”

तब दमनक ने संजीवक को यह कथा सुनाई |

लेखक – विष्णु शर्मा

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