कलम

आज कलम रुक ही गयी
एक तस्वीर बोझिल हुई
रह गयी परछाईयाँ
छोड़ गयी यादें
फिर एक तन्हा रात
ख्वाबो को खिलौना समझ
तोड़ते गए ,
एक नए सवेरे की उम्मीद लिए
फिर घिरा बादल
ओझिल हुई तस्वीर
न लिख पाये कुछ भी
आखिर यह कलम रुक ही गयी |

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