नमस्कार!   रचनाएँ जमा करने के लिए Login करें बकरी दो गॉँव खा गई · हिन्दी लेखक डॉट कॉम
Mar 26, 2016
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बकरी दो गॉँव खा गई

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”हाय ! बकरी दो गॉंव खा गई ।” एक आदमी आगरा की सड़को पर पागलो की भाँति रोता – चिल्लाता घूम रहा था ।लोग आश्चर्य में थे कि भला बकरी गॉव कैसे खा सकती है।आखिर यह समाचार बादशाह अकबर तक पंहुचा। बादशाह ने उसे दरबार में बुलाया।इस आदमी को उन्होंने देखते ही पहचान लिया ।बादशाह को याद आया की वे दो दिन पहले आगरा के पास किसी गॉव में गए थे ।वे बहुत थक गए थे ।यह आदमी उन्हें वहां गन्ने के एक खेत में मिला था , “भाई , गन्ने का रस पिला सकते हो क्या? ” “हाँ , हाँ , आप बैठिये मै अभी लाया ।”
बादशाह अकबर एक पेड की छाया में बैठ गए ।किसान ने खेत में जाकर एक गन्ने तोडा और एक बड़े – से लोटे में रस निकाल ले आया ।बादशाह अकबर ने गन्ने का रस पिलाया तो पहुत खुश हुआ ।” अरे वाह! ऐसा रस तो हमने पहले कभी नही पिया ।कितने गन्ने का रस था यह ? ” उन्होंने पूछा । “जी , यह केवल एक ही गन्ने का रस था ” किसान ने बताया ।
” क्या? एक गन्ने से इतना सारा रस ! “बादशाह को आश्चर्य हुआ ।
“हुजूर ! यह हमारे बादशाह की नियत का कमाल है । अगर उनकी नियत ठीक न हो तो गन्नो में से रस ही न निकले ।”
“अच्छा , कितना लगान देते हो ?” “जी , लगान तो केवल पच्चीस पैसे ! ” बादशाह ने हैरान होकर पूछा ।फिर वे सोचने लगे , ‘ ऐसे रस वाले गन्ने के खेत पर तो अधिक लगान लगाना चाहिए ।आगरा पहुँचते ही इसका लगान बढ़ा दुगा ।’ कुछ देर इधर – उधर की बात करने के बाद अकबर ने कहा, ” अच्छा भाई, चलने से पहले एक रस और पिला दो ।
किसान लोटा लेकर चला गया ।उसने एक गन्ना तोडा लेकिन इस बार लोटा न भरा ।उसने एक के बाद के , तीन – चार गन्ने तोड़े, और उनका रस निकला ।लोटा फिर भी न भरा ।किसान मुह लटकाये हुए आया और लोटा बादशाह की ऒर बड़ा दिया लोटे में थोड़ा -सा ही रस था ।
“अरे ! क्या बात है ? इतना कम रस लेकर क्यों आये ?”
“कुछ नही , हुजूर ! लगता है बादशाह अकबर की नियत बिगड़ गयी है ” अकबर को लगा जैसे किसी ने उन्हें आसमान से जमींन पर पटक दिया हो ।आदमी की नियत बदल जाने से क्या पेड -पौधे पर भी असर पड़ता है ? उन्हें लगा, जैसे एक मामूली किसान एक को इंसानियत का पाठ पड़ा गया हो ।अकबर ने कहा , “भाई तुम जानते हो, मै कौन हुँ?”
किसान संशयपूर्वक बादशाह की ऒर देखने लगा ।”मै बादशाह अकबर हुँ ।” किसान ने घबराकर पूछा , “मैंने कोई गलत बात तो नही कह दी , हुजूर ?”
“नही ! तुमने मुझे वह बात सिखाई है जो बड़े -बड़े विद्वान भी अपने शासको को नही सीखा पाते।आज से तुम्हारे खेत का लगान माफ़ किया ।इस बार लोटा भरकर रस ले लाओ ।” इस बार फिर से एक ही गन्ने के रस से लोटा भर गया ।अकबर ने रस पिया । फिर पीपल का एक पत्ता उठकर बोले, “हम इस पर तुम्हे दो गॉव देने का हुक्म लिख रहे है ।कल आगरा आना और पक्के कागज पर लिखवा लेना ।तुम्हारे खाने -पिने का इंतजाम उनकी आमदनी से हो जायेगा ।” किसान ने पीपल का पत्ता रख लिया ।इधर अकबर बादशाह चले गए, उधर किसान काम में लग गया ।जब किसान को उस पत्ते की याद आई तो वह रोने -चिल्लाने लगा ।अब भला बादशाह उसे कैसे पहचानेंगे ? उस पत्ते को देख बिना गॉव कैसे देंगे ? वह ज़ोर- ज़ोर से रोता- चिल्लाता आगरा पहुँचा, “हाय! बकरी दो गॉँव खा गई।”
बकरी द्वारा दो गॉंव खाने की बात सुनकर बादशाह अकबर किसान के भोलेपन पर हँसे। उन्होंने पक्के कागज़ पर दो गॉंव देने का हुक्म लिखकर उसे दिया और सावधान करते हुए कहा , “इस बार इन गाँवों को बकरी से बचाना ।”
सारा दरबार ठहाकों से गूँज उठा ।

– हरिकृष्ण देवसरे

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लघुकथा

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