अंधविश्वास—कुछ अज्ञान कुछ विज्ञान

जिस समय में आज हम जी रहे हैं वह निश्चय ही विज्ञान की देन है। विज्ञान की नित नई खोजों द्वारा जीवन सुखद और सरल हो रहा है। ऐसे में धर्म से जुड़ी…

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मिट्टी की उर्वराशक्ति एवं उत्पादकता के लिए हरी खाद

भारतवर्ष में हरी खाद का प्रयोग मिट्टी की उर्वराशक्ति एवं उत्पादकता बनाये रखने के लिए अति प्राचीन काल से चला आ रहा है। खेती की सघन कृषि पद्धति के विकास तथा दिनों दिन…

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हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन -विहंगावलोकन

सामान्यत : " इतिहास " शब्द से राजनीतिक व सांस्कृतिक  इतिहास का ही बोध होता है ,किन्तु वास्तविकता यह है कि सृष्टि की कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसका इतिहास से सम्बन्ध…

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विक्रमशिला विश्वविद्यालय : उपेक्षा का शिकार क्यों?

प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण विश्वादालयों में विक्रमशिला विश्वादालाया का एक महत्वपूर्ण स्थान है।यह नालंदा,तेलह!रा,तक्षशिला विश्वादालयों की श्रेणी में है।प!ल वंश के शाशन काल में निर्मित इस विश्वविदलाय के बारे में जानकारी हुमे तिब्बत…

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तिरुक्कुरल 2

तिरुक्कुरल —२. वान चिरप्पु —वर्षा की विशेषता। १, वर्षा के होने से संसार जी रहा है; अतः वर्षा अमृत-सम है; २. वर्षा अनाज और अन्य खाद्य -पदार्थों की उत्पत्ति करती है; प्यासे का…

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तिरुक्कुरल 1

धर्म —प्रार्थना –१ से दस तक तिरुक्कुरल तिरुवल्लुवर तमिल भाषा के साहित्य का सूर है. उनके तिरुक्कुरल का अनुवाद संसार की प्रमुख भाषा में हो चुका है. हाल ही में गुजराती भाषामें भी…

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भारतीय इतिहास का बदलता स्वरूप

भारत :( ऐतिहासिक एवं वर्तमान दृष्टि में ) - जिस देश का इतिहास स्वर्ण अक्षरों में अंकित करने के लिये न जाने कितने महान व्यक्तित्वों ने त्याग, तपस्या,दान, पौरुष व ज्ञान का अदम्य…

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श्री रामरक्षास्तोत्र

विनियोग: अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः। श्री सीतारामचंद्रो देवता। अनुष्टुप्‌ छंदः। सीता शक्तिः। श्रीमान हनुमान्‌ कीलकम्‌। श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः। अथ ध्यानम्‌: ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌। वामांकारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालंकार दीप्तं…

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गायत्री स्तोत्र

सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम शिवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मयीं वेदजननीं परां शक्तिं स्रष्टुं विविध विध रूपां गुण मयीं भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम विशुद्धां सत्त्वस्थाम अखिल दुरवस्थादिहरणीम् निराकारां सारां सुविमल तपो मुर्तिं…

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दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अंबे दुःख हरनी॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥ शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥ रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत…

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हनुमान चालीसा

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार । बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥

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