एक था बचपन

शामें तो बचपन में हुआ करती थी! एक अरसा हुआ,अब वो शाम नहीं होती। जिसका इंतजार रहता था,खेलने के लिए। फिर थोड़ा और बड़े हुए! शाम का इंतजार होता था,दोस्तों को अपने सपने…

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एक था बचपन

एक  था  बचपन ,एक था  बचपन , भोला सा ,प्यारा  सा  ,नन्हा सा बचपन . क्यों  हैवानियत का ग्रास बना  बचपन ?   वोह  नटखटपन ,वोह शोखियाँ और  शरारतें , वोह अल्हड़पन ,…

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बचपन के दिन – 2

..याद बहुत आयें वो बचपन वाले दिन कितने अच्छे थे छुहिया औ पाटी वाले दिन याद बहुत आयें कलम,दवायत वाले दिन आ गए कॉपी और किताबों वाले दिन कब के छूट गए वो…

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कुछ यादें

कुछ यादें बीते दिनों की बचपन का एक जमाना था खुशियों का खजाना थे सब अपने, न कोई बेगाना हमारा भी क्या रंग था अंदाज सबसे अलग था पल भर का था रूठना…

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बीते हुए दिन -1

याद बहुत आयें वो बचपन वाले दिन खेल खिलौनों के संग साथ बिताने वाले दिन गली मोहल्ले सब की चाहत वाले दिन न झगड़े और लड़ाई न टेंशन वाले दिन याद बहुत आयेें…

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गुम होता बचपन

ज़िदगी की शोर में गुम मासूमियत बहुत ढ़ूँढ़ा पर गलियों, मैदानों में नज़र नहीं आयी, अल्हड़ अदाएँ, खिलखिलाती हंसी जाने किस मोड़ पे हाथ छोड़ गयी, शरारतें वो बदमाशियाँ जाने कहाँ मुँह मोड़…

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वत्स ! क्या अब तुम वह नहीं, जो पहले थे

मधुगीति १८०२१२ ब वत्स ! क्या अब तुम वह नहीं, जो पहले थे? निर्गुण की पहेली, अहसास की अठखेली; गुणों का धीरे धीरे प्रविष्ट होना सुमिष्ट लगना, पल पल की चादर में निखर…

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प्रतिस्पर्धा

राहुल   अपनी  कक्षा   का   सबसे   मेघावी   व्  बुध्धिमान  छात्र   था. पढाई   के साथ-साथ   वह   विद्यालय   में होने वाली अन्य  गतिविधियों-खेल कूद व् सांस्कृतिक   कार्यक्रमों   में भी बढ़-चढ़  के भाग लेता था.  विद्यालय   के  …

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बचपन

याद आता है मुझे, मेरा वों बचपन, हल्की-हल्की सर्द हवाएँ, और वो पुरानी अचकन। वो नंगे पाँव घर से भागना, दोस्तों संग मस्ती, कोई मुझे लौटा दे, वो सावन की हस्ती। देखता हूँ…

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बचपन के दिन भी क्या दिन थे

बचपन के दिन भी क्या दिन थे! ना चिंता, ना कोई तनाव, ना तो ढेर सारी ख्वायिशें, ना ही बेशुमार अरमान। बस कुछ कहानी की पुस्तकें, एक प्यारी से सलोनी सी गुडिया, और…

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