टिक-टिक-टिक, चटर पटर

आज सूरज कितना निस्तेज हो रहा है, दिन के एक बजे जब उसे अपने परम तापमान पर होना चाहिए, बिंदी जैसा चमक रहा है आसमान के चेहरे पर, और ये दुष्ट कोहरा जैसे सूरज को ज़ंग में हराने को अमादा हो जैसे कह रहा हो -"निकल कर दिखा, देख मैं धुआं धुआं सा कोहरा तेरा तेरा रास्ते रोके खड़ा हुँ|

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निश्छल गोविन्द

वो सौतेली माँ के साथ कुए पर गया पर पानी नीचे होने से निकाल नहीं सका तो वो खुद भरने भरने लगी तभी गोविन्द की नजर माँ के चुनरी से चिपके बिच्छू पर गई, निश्छल गोविन्द ने आव देखा ना ताव ना ही उसका दुर्व्यवहार देखा बस बिच्छू को पकड़ कर फेक दिया जिस दौरान बिच्छू ने उसे डंक मार दिया,

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