सहमा हिरण मैं

पढ़ रहा हूँ वेदना का व्याकरण मैं हूँ समर में आज भी हर एक क्षण मैं सभ्यता के नाम पर ओढें गए जो नोच फेकूं वो मुखौटे, आवरण मैं रवह रहा हूँ आज…

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घास काटती औरतें

घास काटती औरतों से सीखा जा सकता समय को छप-छपाक काटने का हुनर उनकी स्मृतियाँ दराती के धार में समा गई हैं उन्हें याद नहीं अपने बचपन की सहज आदतें खेल-खिलौने और सहेलियों…

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दीपावली के सब को शुभकामनांए

दीपावली के सब को शुभकामनांए मिठाई और दीयो से दिवाली मनाएं पटाखो को ना जलाए इस का धुआं दिल जलाता है और बटुए में छेद भी करवाता है (संजीव कुमार बर्मन)    

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तुम्हारी याद में पीते जाते है

जिस दिन तुम्हारे दीदार नहीं होते यक़ीनन हम जिन्दो में नहीं होते गम मिटाने को मैखाने चले जाते है तुम्हारी याद में पीते जाते है कसम से मैखाने जाना छोड़ देंगे तुम्हारी आँखो…

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आगमन

राम लौट रहे हैं अयोध्या हाथों में लिए मिट्टी के दीये छंट रही है अमावस्या अंतरिक्ष में अमर्त्य प्रकाश हो रहा है दृष्टिगोचर- वे गए थे आकाशगंगाओं के मुहानों तक रख आय अनेक…

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तुझे देखते ही प्रेम हो गया

तुझे देखते ही प्रेम हो गया मैं तो तेरा रोगी हो गया सामने आते ही जुबां लडखडाती है अपनी तो तबियत बिगड़ जाती है दिल कुछ कहता है जुबां कुछ रोगी का इलाज…

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कलम

आज कलम रुक ही गयी एक तस्वीर बोझिल हुई रह गयी परछाईयाँ छोड़ गयी यादें फिर एक तन्हा रात ख्वाबो को खिलौना समझ तोड़ते गए , एक नए सवेरे की उम्मीद लिए फिर…

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परिवार

बेहिचक बेमिसाल रहती थी, मेरी बीमार बूढ़ी माँ मुझको, अपनी गुदड़ी कालाल कहती थी | राग का राशिफल  बनाती है, मेरी सहधर्मिणी जीता मुझको, अपना हर दावं हार जाती है | (द्धुतिमती ) वर्तिका प्रतीत…

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इंसान हूँ मैं

  पत्थर नहीं इंसान हूँ मैं कैसे कह दिया इंसान हूँ मैं ! पत्थरों के बीच रहा बन गया ह्रदय पत्थर का संवेदनायें खो गयी बूत रह गया बस एक पत्थर का हत्या,…

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जीवन -एक पेड़

संस्कारों की जड़ों , पर खड़ा जीवन का पेड़ सपनो को सजाये , अपने पैरों पर खड़ा पानी ,खत से जीवन निर्वाह , वसुंधरा पर अपनी छाप छोड़े टहनियों पर पत्तो की सजावट…

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हम गुम हो रहे हैं धीरे धीरे

हम गुम हो रहे हैं धीरे धीरे रोज मर रहे हैं धीरे धीरे दांत गिरे, बाल झड़े, आँखो पर चश्मे चढ़े नहीं हो पाते सीधे खड़े, दिल जंवा पर अंदर छल्ले डले खुशिओं…

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