सीखें

भारत के वीरों देश के लिए संघर्ष करना सीखें। अपना पावन धरती के लिए बलिदान करना सीखें। देश को आजाद कराने के लिए अनेकों वीर शहीद हुए। ऐसे वीर शहीदों का सम्मान करना…

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देश ये अखंड धरा

ये देश जरा ये अखंड धरा चमके चम-चम ये स्वर्ण ख़रा छूने के लिए इस मिट्टी को भूमि पर खुद रब उतरा रसधार लिए बहती सरिता बहे तेज़ तरंग गाती कविता सागर के…

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नव वर्ष का विहान

सूर्य नभ से लेकर आए, नया एक स्वर्णिम विहान। नई उमंगो ने भरी उड़ान। लौटी कलियों की मुस्कान। लगता सब कुछ नूतन सा। नेह का मेघ हर उर में बरसा। मृत आशाएं हुई…

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प्रकृति संरक्षण

मौसम के इस शांत एकांत में, बचते छिपते चल दिए। नाक में मास्क लगाए, सांस बचाकर चल दिए। धूप बीच धुंध समाए, जगह जगह प्रदूषण फैलाये। प्रकृति पृथ्वी की बैचेनी को, सरकार भी…

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एक मोड़

रोना भी चाहें तो वो रोने भी नहीं देता वो शख़्स तो पलकें भी भिगोने नहीं देता वो रोज़ रूलाता है हमें ख्वाबों में आ कर सोना भी जो चाहें तो वो सोने…

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सबसे आगे

सोच रही हूँ मैं, इस नई सुबह पर, चंद लाइनें उपहार स्वरूप लिख दूँ, अनुभव पत्रिका तुम्हारे लिए। जो जीवन के धरातल पर, उतरी हो नई सुबह सी, पहली किरण की तरह, नई…

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खत एक फौजी का

माँ डरना नहीं मैं महफूज हूँ तेरा लाल बहादुर है सिर कटा लेगा मगर आँचल कभी तुम्हारा दाग होने नहीं देगा जिस तरह आपने बाबूजी के शहीद होने पर मुझे देश के लिए…

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बहुत याद आते हैं

जो मैं इन कदमों को ज़रा सा पीछे लेलूं तो बीते हुए कुछ सफर आज भी बहुत याद आते है। मैं उस गुजरे हुए कल को ज़रा टटोलूं तो कुछ गुजरी हुई हसीन…

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चलो घूम आयें

सर्दी का मौसम ये सर्द हवाएं सुबह-सुबह आओ चलो घूम आयें निकलता ये सूरज लगे प्यारा प्यारा झील का किनारा लगे न्यारा न्यारा ठण्डे पानी को आओ गरम कर आयें सर्दी का मौसम…

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ठिठुरती भोर

सिकुड़ रही है कुदरत सारी, ठण्डी ठण्डी लहरों से। भोर ठिठुरती देख गगन से, सहलाता रवि किरणों से। बिछा गयी है रात अँधेरी, तुहिन बिंदु कुछ तिनकों पर। उषा काल में चमक उठे…

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फैसले की घड़ी

मिली नज़रें उनसे तो समझा इबादत हो गई। देखते ही रह गए और उनसे मुहब्बत हो गई।। तरसते थे दो मीठे बोल सुनने को हम। सियासत दिल पर की और हुकूमत हो गई।।…

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नववर्ष के आगमन पे

समय का पहिया 365 दिन घूमकर फिर नववर्ष की पहली तारीख पर आकर टिक जाता है एक बार फिर भरपूर उमंग के साथ पूरी गति से वही भूली बिसरी यादों को उसी पुराने…

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हिमाचल का गौरव

समाधिस्थ यति के सदृश हिम प्रान्त के शिखर यहां छ्ल-छ्ल करती सरिताएं काल चक्र पहिये से यहां ऋगवेद की सृजन धरा यही आकाश गंगा सी पावन नीर शिखर पर खगोल सी सुमता ऋषियो…

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गाँव और शहर

हद है हर शहरी गाँव को कोसे, उसे कहाँ पता शहर की जननी गाँव ही तो है। और जहाँ बसे भारत माँ वो गांव ही तो है जहाँ मिले संस्कृति, सभ्यता भाईचारा का…

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