हिन्दी

लिखते रहना ही हिन्दी है जरा सुनो भाई बदलाव लाने के लिए स्वार्थों को त्यागना पड़ेगा उदाहरण आपके करीब ही मिल जायेंगे। अनिल कुमार सोनी

Continue Reading

ट्रेन और टॉयलट…!!

ट्रेन और टॉयलट...!! तारकेश कुमार ओझा ट्रेन के टॉयलट्स और यात्रियों में बिल्कुल सास - बहू सा संबंध हैं। पता नहीं लोग कौन सा फ्रस्ट्रेशन इन टॉयलट्स पर निकालते हैं। आजादी के इतने…

Continue Reading

आभार

शब्दों को रूप देने का सपना हुआ साकार हिंदी लेखक टीम का बहुत-बहुत आभार । ऐसे ही मिलजुल आगे बढ़ते रहें, कुछ लिखते रहें कुछ पढ़ते रहें । बढ़ता ही रहे हमारा लेखक…

Continue Reading

लेखक शास्त्री राहुल बौद्ध सिंह कुशवाहा

Rahul Singh bauddha kushwaha 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🍀🌲🍃🌿🌴🌾🌺🍃🌿🌻🌴🍁🌼🌸🍃🌲 यदि मैं कहूँ कि * एक आदमी 20 लीटर पानी एक बार मे पी गया * एक #मेढक हाथी को निगल गया * भालू हवा में उड़ता है…

Continue Reading

भगवान बुद्ध के कल्याण कारी सूत्र ।। नमो बुध्दाय।। राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

🌷🌷🌷🌷सभी को धम्म कामनाएँ 🌷🌷🌷 नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्म बुद्धस्स, ३ बार बुद्धं संकेतं, धम्मं ज्ञं, संघं गणं गच्छामि, ३ बार ************ गाथा - बाहु सच्चञ्च सिप्पं च, विन्यो च। कुशाक्खितो! सुभासिता च…

Continue Reading

वो आँखे

सरपट भागती ट्रैन के साथ और हर बदलते नजारे के साथ बदल जाते है उसके चेहरे की भावनाएं,उसकी वो हँसी, वो नजाकत भरी नजरें पल पल बदलते नजारे के साथ बदलती उसकी हर…

Continue Reading

जिंदगी में दौर इम्तिहान का जो चल रहा

दौर इम्तिहानों का जो चल रहा क़भी हार रहा क़भी जीत रहा क़भी उलझा किसी सवाल में क़भी किसी सवाल का जवाब बन रहा जिंदगी में दौर इम्तिहान का जो चल रहा उलझा…

Continue Reading

वो भी क्या मुलाकात थी

वो भी क्या मुलाकात थी वो खोए रहे खुद में मैं भी बस चुपचाप थी मुददतों बात की मुलाकात थी पहली और शायद आखिरी मुलाकात थी जब वो मेरे इतने नजदीक था न…

Continue Reading

कर लेती है खुद से ही बेवफाई तभी तो वो तेरी कहलायी

कर लेती है खुद से ही बेवफाई तभी तो वो तेरी कहलायी किसी की माँ किसी की बेटी किसी की पत्नी किसी की प्रेमिका बन पायी कर लेती है खुद से ही बेवफाई…

Continue Reading

मिट्टी मेरे गांव की

"मिट्टी मेरे गांव की"- बुन्देली काव्य संग्रह:- लेखिका - जयति जैन "नूतन" प्रकाशक- श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली बुंदेलखंड में जन्मी लेखिका ने अपनी मातृभाषा में 104 पेज का बुन्देली काव्य संग्रह "मिट्टी मेरे…

Continue Reading

वो सावन के झूले

हमारा घर मतलब बाबूजी का घर झरोखा महल जैसा था.बडी रौनक होती थी उन दिनों.बाबूजी के यंहा सामने की छपरी मे झूला डला था.जिसपर हम कभी भी बैठकर झूलते थे,साथ में रेडियो भी…

Continue Reading
Close Menu