जब यादगार बन जाए अनचाही यात्राएं ….!!

जब यादगार बन जाए अनचाही यात्राएं ….!! तारकेश कुमार ओझा जीवन के खेल वाकई निराले होते हैं। कई बार ऐसा …

भूख – प्यास की क्लास ….!!

भूख – प्यास की क्लास ….!! तारकेश कुमार ओझा क्या होता है जब हीन भावना से ग्रस्त और प्रतिकूल परिस्थितियों …

डोटल गांव डायरी

सर्वप्रथम हमें घर के बाहर , गोरियां (घिनोर) , सीटोअ , घुघुत , निरचि काअ , जैसे अनगिनत रंग , बिरंगे पंछी देखने को मील जाते थे ।

पहाड़ का अस्तित्व- ( पहाड़ की नारी)

नारी के बिना पहाड़ अधूरा – या यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि पहाड़ का अस्तित्व ही नारी के …

यूकेलिप्टस, कौवे और मैं

हर रात जैसे तैसे करवटें ले लेकर गुजरती। हर रात सुबह का इंतजार, हर सुबह जेठ की भरी दुपहरी का …

हावड़ा – मेदिनीपुर की लास्ट लोकल ….!!

कई तरह की सही – गलत धारणाएं हो सकती है। जिनमें एक धारणा यह भी है कि देर रात या मुंह अंधेरे महानगर से उपनगरों के बीच चलने वाली लोकल ट्रेनें अमूमन खाली ही दौड़ती होंगी।

मेरी बुआ ही मेरी माँ

दुनियाँ की किसी भी माँ का सम्पूर्ण जीवन तो अपने परिवार, पति और बच्चों के लिये ही समर्पित रहता है। …

कोलकाता की वो पुरानी बस और डराने वाला टिकट….!!

स्टैंड से साइकिल निकाली तो पता लगा कि 12 घंटे से अधिक खड़ी रहने
की वजह से मुझे एक रुपये का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा।

नालायक बेटा

अब न माँ न माँ से जुड़े रिश्तें…. कोई मिलते भी है तो अजनबी की तरह। अब दिल मे कोई ख्वाहिश भी नही रही, माँ बहुत कुछ अपने साथ ले गयी….बहुत कुछ नही सबकुछ।