दीवारें बोल उठेंगी

ऐसा भी कहीं होता है! कुछ भी, विज्ञापन दिखा देते हैं। फिर सोचा एक बार ट्राई करने में क्या जाता है, मैंने दीवार की तरफ मुंह किया और पूछा क्या तुम बोलना जानती हो? उधर से आवाज आई, क्या आप सुनना पसंद करोगे? अरे वाह! यह तो चमत्कार हो गया। मैंने तो सुना था दीवारों के कान होते हैं, लेकिन इसकी तो जुबां भी है….

माँ की दुआ

तुम भी दर्द कब तक देते, मैं भी दर्द कब तक सेहती
तुम भी उतने बुरे नहीं हो, मैं भी अब इतनी भली नहीं।

जिसके साथ माँ की दुआ हो उसके साथ गलत नहीं हो सकता। माँ की दुआ उसका रक्षा कवच बनकर हर मुसीबत से उसकी रक्षा करता है। किसी काम से अमरोहा अकेले ही जाना था लेकिन माँ दुआएं, पापा का आशीर्वाद, मैम की शुभकामनायें और मेरे भगवान जी का साथ है किसी और सहारे की क्या ज़रूरत?

धन्यवाद गुरु देव

ईश्वर की असीम कृपा रही है मुझपर, फर्स्ट लेकर पीएचडी तक सभी अच्छे गुरु मिले। मेरे व्यक्तित्व निर्माण में अनेक गुरुजन सहयोग है।

मेरी पहली रेल यात्रा

आज भी याद आता है अपनी वो पहली रेल यात्रा…कक्षा एक की विद्यार्थी मैं, अशोक कुमार के स्वर में वो …

बारिश और बचपन

बारिश, मिट्टी की खुशबू, कागज की कश्ती… बारिश में भीगने पर बच्चे को डांट रहे पिता को देख, अपने बचपन …

सुनो बहू, क्या लाई हो

शादी को अभी कुछ ही वक़्त हुआ है……। मायके से ससुराल वापसी पर….,  सासू मां और  संग सहेलियां पूछने लगती …

दीवार पर टंगी पिता की तस्वीर

आज पिता को गुजरे पूरा एक महीना हो चुका है।चलो सब  कार्य  अच्छी तरह से  निपट चुका है। अब मैं …

यादों के पटल से ‘मेरी दादी’ (संस्मरण)

संस्मरण यादों के पटल से ‘मेरी दादी’ आज की विधा है संस्मरण यह जानकर मेरे मानसपटल पर सर्वप्रथम जो पहली …

होस्टल वार्डन — मां बाप दोनों

बिड़ला हॉस्टल के दिनों में उन्होंने हमारे माँ और पिता दोनों की भूमिका बखूबी निभाई. मैस में अच्छा भोजन, स्टडी-अॉवर्स में जरूरी पढ़ाई, रविवार की प्रार्थना-सभा और रविवार शाम को बिट्स अॉडी में मूवी — सब उनके प्रयासों से संभव होता था.

बिड़ला हॉस्टल, पिलानी की रविवारीय प्रार्थना सभा

हमारे वक्त (१९७५-१९७८) के दौरान  बिड़ला हॉस्टल, पिलानी में रविवार की प्रार्थना सभा सबको बहुत भाती थी जो मैस के …

जग्गी तांगे वाला

वैसे जग्गी बहुत मस्त तबियत का बांका नौजवान था जो हम सब को बैठा कर तांगा चलाते हुए उस वक्त के फिल्मी गाने भी गाता था और हम सब बच्चे भी ऊंची आवाज़ में गाने में उसका साथ देते थे। मुख्य गीत होते थे – “मैं जहाँ चला जाऊं बहार चली आए, ओ महक जाए राहों की धूल, मैं बनफूल बन का फूल” और “लड़की चले जब सड़कों पे, आये कयामत लड़कों पे” ।

कलाकार श्री सत्यपाल सोनकर

“…और मैं अनूप जलोटा का सहपाठी भी था।” *कलाकार श्री सत्यपाल सोनकर पिछले शादी के सीज़न से ये आदत बनायी …