इश्क़ का फरमान

ग़ज़ल इश्क़ का फरमान लाया दुवाओं का मौसम आया पहलों में बैठा हूं आजकल बिना दिहाड़ी का मजदूर हूं ज़बान से बरकत दिया बहुत सोचकर उसे मिलोगे कैसे... ज़िंदगी कैसे बसर होंगी मन…

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रेत का घरौंधा बनाया

ग़ज़ल घरौंदा बहुत बनाया रेत पे। नदी के लहरों ने बिखरा दिया।। हमको याद है बचपन की दास्तां। जवानी में बिखर गया सारे सपने।। क्या बताएं बालपन की कहानी। छुप-छुपाई खेलना सारे याद…

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तुमें हमने चाहा कुरान की तरह

ग़ज़ल तुम्हें हमनें चाहा कुरान की तरह! तुनें जीवन से निकाला दूध से छाली की तरह!! वक़्त बेवफ़ा हो गया मजनूं की तरह! शाहजहां ने ताजमहल बनवा दिया मुमताज़ की तरह!! कसमें खाई…

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किसानों का दर्द

किसानों का दर्द ((कविता)) खेत की जुताई किया बीजों की बुनाई किया....... बहुत जतन से सींचा बड़ी जतन से घास निकालें... छोटी - छोटी कीटों से बचाया चूहों से फ़सल को बचाया प्रकृति…

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कविता (विश्व पुस्तक दिवस)

विश्व पुस्तक दिवस के शुभअवसर पर प्रस्तुत है कुछ पक्तियां:- किताब तू मेरी आरजू है तू मेरी दुनियां, तू मेरी संसार तुमसे दूर हुआ तो अज्ञानता आ जाती एक तेरे सिवा कौन है…

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सीधा साधा लड़का…

मैं ठहरा सीधा साधा लड़का उसे पसन्द था जंगली जवानी करम का खेल है ऐसा सुनते है भईया जो भी है मेरी है लुगाई। अब सातों फेरों की इज्जत रखेंगे हम है झारखंडी…

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तन्हाई में तू और मैं

...ग़ज़ल.... तारों के निकट बैठा तो खुद को अंधेरे में पाया उजालों से डर लगने लगा भक्त बन बैठा हूँ इश्क़ का किताब जैसा ग्रंथ बन गया गमों का हिसाब कितना रखूं सिसकियों…

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कविता

हिंदी का इतिहास हुआ पुराना हिंदी का परिभाषा हुआ पुराना नई दौर की हुई हिंदी फ़ेसबुक, स्टेटस का हुआ जमाना हिंदी का उत्पति के सिद्धांत हुए निराले हिंदी के आचार्य का हुआ सिद्धांत…

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पृथ्वी दिवस पर खास

पृथ्वी दिवस पृथ्वी दिवस हम सब मनाते हैं सर साल पृथ्वी के ख़ातिर जिया???? ख़ुद की रोजमर्रे से फ़ुर्सत कहां! रोटी के लिए पृथ्वी घर बनाने के लिए मॉल बनाने के लिए एयरपोर्ट…

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ग़ज़ल

कोरोना के चक्कर में हँसिओं के दर्शन दुर्लभ हो गए देवियों के दर्शन हुए मुश्किल हम भक्त अभागें त्राहिमान हो गए कोरोना ने रोने पे किया विवश अब धरती पे चांद नज़र नही…

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कविता

पोस्ट ००१... नफ़रत कभी कभी दिल में उभर आती है ख़ुद से भी ख़ुद से हो जाती है दिमाग में सौ उलझने हो जाती है मन के अंतद्वंद्व में प्रतीत होता है सबकुछ…

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कोरोना और करूणा….

  कोरोना और करूणा .... तारकेश कुमार ओझा भयावह रोग कोरोना से मैं भी बुरी तरह डरा हुआ हूं। लेकिन भला कर भी क्या सकता हूं। क्या घर से निकले बगैर मेरा काम…

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कुछ यादें

इस रचना के माध्यम से मैं जो बात कहना चाहता हूँ यदि आप तक पहुंचे तो मुझे जरुर बताइयेगा🙏 कुछ यादें (बीते दिनों की) बचपन का एक जमाना था खुशियों का खजाना सब…

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खा जाओ इसको तल के

खा जाओ इसको तल के शैतानियों के बल पे,दिखाओ बच्चों चल के, ये देश जो हमारा, खा जाओ इसको तल के। किताब की जो पाठे  तुझको पढ़ाई  जाती, जीवन में सारी बातें कुछ…

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