हिन्दी व्याकरण2018-02-18T18:44:12+00:00

भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों के सामने भली-भांति व्यक्त कर सकता है और दूसरों के विचारों को स्पष्टतया समझ  सकता है l  पशु पक्षी जो बोली बोलते हैं उससे वह अपने दुख सुख आदि मनोभावों को व्यक्त कर सकते हैं परंतु इसके सिवा उन बोलियों से और कोई विचार व्यक्त नहीं हो सकता है l मनुष्य की भाषा से हर प्रकार के विचारों को भलीभांति व्यक्त किया अथवा समझा जा सकता है इसलिए इसे व्यक्त भाषा कहते हैं बाकी अन्य   अव्यक्त भाषा अथवा बोलियां कहलाती है l

भाषा निरंतर बहती नदी के समान है या कभी स्थिर नहीं रहती इसमें सदा परिवर्तन हुआ करते हैं l  आज जो हम हिंदी बोलते हैं वह पुराने समय में बोले जाने वाली हिंदी से काफी भिन्न है l भाषा में परिवर्तन प्रायः बहुत ही धीरे-धीरे होता है और इनके परिवर्तन से नई-नई भाषा है उत्पन्न हो जाती है l  भाषा पर सभ्यता जलवायु और स्थान का भी प्रभाव पड़ता है l  आप जिन शब्दों का उच्चारण जिस प्रकार कर सकते हैं संभव है दूसरी जलवायु यह सभ्यता के लोग उन शब्दों का उच्चारण ठीक उसी प्रकार ना कर पाए l  इन्हीं प्रभाव के कारण बहुत सारे नए नए शब्दों का भाषाओं में समावेश होता रहता है l

व्याकरण शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘भलीभांति समझना’ या ‘भली-भांति समझाना’ है l व्याकरण में वह नियम समझाएं जाते हैं जो अमुक भाषा के विद्वानों के द्वारा स्वीकृत शब्दों के रूपों और प्रयोगों में  दिखाई देते हैं l  व्याकरण भाषा के अधीन है और भाषा के अनुसार ही बदलता रहता है l  कोई भी वैयाकरण  अपनी तरफ से नियम बनाकर भाषा में बदलाव नहीं कर सकता, वह सिर्फ इतना ही कह सकता है कि किसी शब्द अथवा वाक्य का अधिक शुद्ध प्रयोग यह है अथवा इसका प्रयोग अधिकता से किया जाता है पर उस पर सम्मति मानना या ना मानना सुधीजनों के इच्छा पर निर्भर है l  भाषा को नियमबद्ध करने के लिए व्याकरण नहीं बनाया जाता अपितु भाषा पहले बोली जाती है और उन के आधार पर व्याकरण की रचना की जाती है l

वर्णमाला

ध्वनि

ध्वनि शब्दों का आधारस्तंभ है, जिसके बिना शब्द की कल्पना नहीं की जा सकती। अ, आ, क, ग इत्यादि जब मनुष्य बोलता है तबये ध्वनियाँ कहलाती हैं।  इनके लिखित रूप को वर्ण कहते हैं ।

वर्ण

वर्ण वह मूल ध्वनि है जिसका कोई खंड या टुकड़ा न हो सके।  जैसे – अ, व, ग, च इत्यादि । वर्ण को अक्षर भी कहते हैं।  वर्णो के  समूह को वर्णमाला कहते हैं।

मूलतः हिंदी में ५२ वर्ण हैं।

हिंदी वर्णमाला को 3  भागों में विभाजित किया जा सकता है।

  1. स्वर वर्ण 2. व्यंजन वर्ण 3. अयोगवाह

स्वर वर्ण

स्वर उन वर्णो को कहते हैं, जिनका उच्चारण बिना अवरोध के होता है। इनके उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता नहीं ली जाती है। हिंदी में स्वर वर्णो की संख्या 11 है।

अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ

व्यंजन वर्ण

जिसके उच्चारण में स्वर वर्णों की सहायता ली जाती है।  प्रत्येक व्यंजन वर्ण के उच्चारण में ‘अ’ की ध्वनि होती है. जैसे – क- क् +अ , ट – ट् + अ

व्यंजन वर्ण

कवर्ग – क, ख, ग, घ, ङ
चवर्ग – च, छ, ज, झ, ञ
टवर्ग – ट, ठ, ड, ढ, ण
तवर्ग – त, थ, द, ध, न
पवर्ग – प, फ, ब, भ, म
अंतःस्थ – य, र, ल, व
ऊष्म – श, ष, स , ह
सयुंक्त अक्षर – क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
द्विगुण व्यंजन – ड़ और ढ़

अयोगवाह

अनुस्वार और विसर्ग को अयोगवाह कहते हैं,क्योंकि न तो स्वर हैं न ही व्यंजन परन्तु ये स्वर के सहारे चलते हैं. इनका प्रयोग स्वर और व्यंजन दोनों के साथ होता है।  जैसे – अंगूर , कंगन।

अनुस्वार – अं , विसर्ग – अः

लिखित भाषा में  मूल ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिन्हों का प्रयोग किया जाता है उन्हें भी वर्ण कहते हैं; परंतु जिस रूप में यह लिखे जाते हैं उन्हें लिपि कहते हैंl हिंदी भाषा जिस लिपि में लिखी जाती है उसका नाम देवनागरी लिपि हैl

व्यंजन वर्णों के अनेक उच्चारण को लिखने के लिए उनके साथ स्वर्ग जोड़े जाते हैं व्यंजन वर्णों में स्वर वर्ण ओके मिलने से स्वर का जो रुप हो जाता है उस रूप को मात्रा कहते हैंl

स्वर वर्ण  ‘अ’  की कोई मात्रा नहीं होती है,  हर एक  हर एक व्यंजन वर्ण के उच्चारण में यह सदैव ही निहित होता हैl  जिन व्यंजन वर्ण के उच्चारण में अ की ध्वनि  नहीं दिखानी होती है उसमें हल का प्रयोग करते हैंl    जैसे – क्+अ= क, ख्+अ = ख इत्यादि

आ, ई, ओ, औ  व्यंजन वर्णों के बाद लगाई जाती हैl जैसे – का, की, को, कौ l

इ की मात्रा व्यंजन वर्ण के पहले लगाई जाती हैl  जैसे – कि l

ए और ऐ की मात्रा व्यंजन वर्ण के ऊपर लगाई जाती है l  जैसे – के, कै l

उ,ऊ और ऋ की मात्रा व्यंजन वर्ण के नीचे लगाई जाती हैl  जैसे – कु, कू , कृ l

अं और अ: को लेकर और ऋ की मात्रा को छोड़कर व्यंजन वर्णों के साथ सारी सारे स्वर्ण वर्ण के मिलाप को बारहखड़ी कहते हैं l

क् की बारहखड़ी –

क, का, कि, की, कु, कू के,कै, को, कौ, कं, कः l

ख् की बारहखड़ी

ख, खा, खि, खी, खु, खू, खे, खै, खो, खौ, खं, खः l

व्यंजन वर्ण दो प्रकार से लिखे जाते हैं; – 1. खड़ी पाई के साथ और 2. बिना खड़ी पाई के l

ङ, छ, ट , ठ , ड, ढ, द और र को छोड़कर बाकी सारे व्यंजन वर्ण खड़ी पाई के साथ लिखे जाते हैं जैसे – क, ख, च, न, प  इत्यादि l

सभी वर्णों के ऊपर एक आड़ी रेखा खींची जाती है जिन्हें ध और भ में बीच में तोड़कर लिखा जाता है l

देवनागरी लिपि में जब कभी वर्णों के उच्चारण का नाम लेना होता है तब उस वर्ण के बाद कार जोड़कर उसके नाम को सूचित किया जाता है l  जैसे –  आकार, ककार, मकार इत्यादि l

जब दो या दो से अधिक व्यंजनों को बिना स्वर की मात्रा के लिखा जाता है तब उन्हें सहयोगी अथवा संयुक्त व्यंजन कहते हैं l जैसे- त्र, क्य,स्म l   दो से अधिक वर्णों  से भी संयुक्त अथवा सहयोगी व्यंजन वर्ण बनते हैंl  जैसे –  मत्स्य, स्तम्भ, महात्म्य  इत्यादि l

संजोग में वर्ण उसी क्रम में लिखे जाते हैं जिस क्रम में उनका उच्चारण होता हैl जैसे- सत्कार, अशक्त, यत्न  इत्यादि l

पाई वाले आधे वर्णों की पाई संयोग में हटा दी जाती हैl जैसे – प्याला,  महात्मा l

यदि र कार के पीछे कोई व्यंजन हो तब रकार उस व्यंजन के ऊपर लिखा जाता है जिसे रेप भी कहते हैंl  जैसे- धर्म अर्थ कर्म मर्म l

जबरा कार किसी व्यंजन के बाहर जाता है तो उसके दो रूप हो जाते हैंl  

पहला रूप –  चक्र, भद्र  इत्यादि l  दूसरा रूप –  राष्ट्र,  महाराष्ट्र  इत्यादि l

ङ, ञ, ण, न, म व्यंजन वर्ण जब अपने ही वर्ग के व्यंजन वर्णों के साथ मिलकर सहयोग करते हैं तब उनके बदले विकल्प के रूप में अनुस्वार आ सकता है l  जैसे – गङ्गा – गंगा , चञ्चल – चंचल,  पण्डित- पंडित,  तन्द्रा- तंद्रा,  कम्पन- कंपन l

कर्ता और क्रिया का मेल : – 

  1. यदि कर्तृवाच्य वाक्य में कर्त्ता विभक्त्तिरहित है, तो उसकी क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्त्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होंगे। जैसे – करीम किताब पढता है। सोहन मिठाई खता है। रीता घर जाती है।
  2. यदि वाक्य में एक ही लिंग , वचन और पुरुष के अनेक विभक्त्तिरहित कर्त्ता हों और अंतिम कर्त्ता के पहले और संयोजक आया हो, तो इन कर्त्ताओं की क्रिया  उसी लिंग के बहुवचन में होगी। जैसे – मोहन और सोहन सोते हैं। आशा, उषा और पूर्णिमा स्कूल जाती हैं।
  3. यदि वाक्य में दो भिन्न लिंगों के कर्त्ता हों और दोनों दवंदसमास के अनुसार प्रयुक्त हों,  तो उनकी क्रिया पुलिंग बहुवचन में होगी जैसे – नर- नारी गए। राजा – रानी आये। स्त्री – पुरुष मिले । माता- पिता बैठे हैं।
  4. यदि वाक्य में दो भिन्न विभक्तिरहित एकवचन कर्त्ता हों और दोनों के बीच और संयोजक आये, तो उनकी क्रिया पुलिंग और बहुवचन में होगी राधा और कृषण रास रचते हैं। बाघ और बकरी एक घाट पानी पिटे हैं।
  5. यदि वाक्य में दोनों लिंगो और वचनों के अनेक  कर्त्ता हों, तो क्रिया बहुवचन में होगी और उनका लिंग अंतिम कर्त्ता के अनुसार होगा जैसे – एक लड़का , दो भूढे और अनेक लड़कियां जाती हैं। एक बकरी, दो गायें और बहुत- से बैल मैदान में चरते हैं।
  6. यदि वाक्य में अनेक कर्त्ताओं के बीच विभाजक समुच्चयबोधक अव्यय या अथवा व रहे , क्रिया अंतिम कर्त्ता के लिंग और वचन के अनुसार होगी। जैसे – घनश्याम की पांच दरिया व एक कंबल बिकेगा। हरी का एक कंबल या पांच दरिया बिकेंगी। मोहन का बैल या सोहन की गायें बिकेंगी।
  7. यदि उत्तमपुरुष, मध्यपुरुष और अन्यपुरुष एक वाक्य में कर्त्ता बनकर आएं तो क्रिया उत्तमपुरुष के अनुसार होगी। जैसे – वह और हमजायेंगे। हरी, तुम और हम सिनेमा देखने चलेंगे। वह, आप और मैं चलूँगा।

कर्म और क्रिया का मेल

  1. यदि वाक्य में कर्त्ता ने विभक्ति से युक्त हो और कर्म की ‘को’ विभक्ति न हो, तो उसकी क्रिया कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होगी। जैसे – आशा ने पुस्तक पढ़ी। हमने लड़ाई जीती। उसने गाली दी। मैंने रूपये दिए। तुमने क्षमा मांगी।
  2. यदि कर्त्ता और कर्म दोनों विभक्तिचिन्हों से युक्त हो, तो क्रिया सदा एकवचन पुलिंग और अन्यपुरुष  में होगी । जैसे – मैंने कृषण को बुलाया। तुमने उसे देखा। स्त्रियों  ने पुरुषों को ध्यान से देखा ।
  3. यदि कर्त्ता को प्रत्यय से युक्त हो और कर्म के स्थान पर कोई क्रियार्थक संज्ञा आये तो क्रिया सदा पुलिंग , एकवचन और अन्यपुरुष में होगी। जैसे – तुम्हे पुस्तक पढ़ना नहीं  आता। अलका को रसोई बनाना नहीं आता। उसे समझकर बात करना नहीं आता।
  4. यदि एक ही लिंग- वचन के अनेक प्राणनिवाचक विभक्तिरहित कर्म एक साथ आएं, तो क्रिया उसी लिंग में बहुवचन होगी। जैसे – श्याम ने बैल और घोड़ा मोल लिए। तुमने गाय और भैंस मोल ली।
  5. यदि एक ही लिंग- वचन के अनेक प्राणनिवाचक – अप्राणनिवाचक अप्रत्यय कर्म एक साथ एकवचन में आये, तो क्रिया भी एकवचन में होगी। जैसे – मैंने एक गाये और एक भैंस खरीदी। सोहन ने एक पुस्तक और एक कलम खरीदी। मोहन ने एक घोड़ा और एक हाथी बेचा।
  6. यदि वाक्य में भिन्न -भिन्न लिंग के अनेक प्रत्यय कर्म आएं और वे और से जुड़े हों, तो क्रिया अंतिम कर्म के लिंग और वचन में होगी।

संज्ञा और सर्वनाम का मेल

  1. वाक्य में लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार सवर्नाम उस संज्ञा का अनुसरण करता है। जिसके बदले उसका प्रयोग होता है। जैसे – लड़के वे ही हैं। लड़कियां भी ये ही हैं।
  2. यदि वाक्य में अनेक संज्ञाओं के स्थान पर ही सर्वनाम आये , तो वह पुलिंग बहुवचन में होगा। जैसे – रमेश और सुरेश पटना गए हैं, दो दिनबाद वे लौटेंगे। सुरेश, शीला और रमा आये और वे चले भी गए।

वाक्यगत प्रयोग

वाक्य का सारा  सौंदर्य पदों अथवा शब्दों के समुचित प्रयोग पर आश्रित है। पदों के स्वरूप और अौचित्य पर ध्यान रखे बिना शिशस्त और सुन्दर वाक्यों की रचना नहीं होती। प्रयोग – सम्बन्धी कुछ आवश्यक निर्देश निम्नलिखित हैं।

  1. एक वाक्य से एक ही भाव प्रकट हो।
  2. शब्दों का प्रयोग करते समय व्याकरण- सम्बन्धी नियमों का पालन हो।
  3. वाक्य रचना में अधूरे वाक्यों को नहीं रखा जाये।
  4. वाक्य – योजना में स्पष्टता और प्रयुक्त शब्दों में शैली – सम्बन्धी शिष्ट्ता हो।
  5. वाक्य में शब्दों का परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध हो। तात्पर्य यह है की वाक्य में सभी शब्दों का प्रयोग एक ही काल में, एक ही स्थान में और एक ही साथ होना चहिये।
  6. वाक्य में ध्वनि और अर्थ की संगति पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  7. वाक्य में व्यर्थ शब्द न आने पाएं।
  8. वाक्य – योजना में आवश्यकतानुसार जहाँ- तहाँ मुहावरों और कहावतों का भी प्रयोग हो।
  9. वाक्य में एक ही व्यक्ति या वस्तु के लिए कहीं ‘यह’ और ‘वह’ , कहीं आप और कहीं ‘तुम’, कहीं ‘इसे’ और कहीं ‘इन्हे’, कहीं ‘उसे’ और कहीं ‘उन्हें’, कहीं  ‘उसका’ और कहीं ‘उनका’ कहीं ‘इनका’ और कहीं ‘इसका’ प्रयोग नहीं  होना चाहिए।
  10. वाक्य में पुनरुक्तिदोष नहीं होना चाहिए। शब्दों के प्रयोग में अौचित्य पर ध्यान देना चाहिए।
  11. वाक्य में अप्रचलित शब्दों का व्यवहार नहीं होना चाहिए।
  12. परोक्ष कथन हिंदी भाषा की प्रवृति के अनुकूल नहीं है। यह वाक्य अशुद्ध है- उसने कहा की उसे आपत्ति नहीं है। इसमें  ‘उसे’ के स्थान पर ‘मुझे’ होना चाहिए।

अन्य ध्यातव्य बातें

  1. प्रत्येक’, ‘किसी’, ‘कोई’ का प्रयोग – ये सदा एकवचन में प्रतुक्त होते हैंबहुवचन में प्रयोग अशुद्ध है।

जैसे-  प्रत्येक – प्रत्येक व्यक्ति जीना चाहता है। प्रत्येक पुरुष से मेरा निवेदन है।  कोई – मैंने अब तक कोई काम नहीं किया। कोई ऐसा भी कह सकता है |  किसी- किसी व्यक्ति का वश नहीं चलता। किसी-किसी का ऐसा कहना है। किसी ने कहा था।

टिप्पणी – ‘कोई’ और ‘किसी’ के साथ ‘भी’ का प्रयोग अशुद्ध है। जैसे – कोई भी होगा, तब काम चल जायेगा। यहाँ ‘भी’ अनावश्यक है। ‘कोई’ और ‘किसी’ में ‘भी’  का भाव वर्त्तमान है।

  • दवारा’ का प्रयोग– किसी व्यक्ति के माध्यम से जब कोई काम होता हैतब संज्ञा के बाद ‘दवारा’ का प्रयोग होताहै;वस्तु (संज्ञा)  केबाद ‘से’ लगताहै।

जैसे- सुरेश दवारा यह कार्य संपन्न हुआ। युद्ध से देश पर संकट छटा है।

  • सब’ और ‘लोग’ का प्रयोग – सामान्यतः दोनों बहुवचन हैं। पर कभीकभी ‘सब’ समुच्चय – रूप में एकवचन में भीप्रयोग होता है।

जैसे- तुम्हारा सब काम गलत होता है।

  • यदि काम की अधिकता का बोध हो तो ‘सब’ का प्रयोग बहुवचन में होगा।

जैसे- सब यही कहते हैं।  हिंदी में ‘सब’ समुच्चय और संख्या – दोनों का बोध कराता है।’

  • लोग’ सदा बहुवचन में प्रयुक्तहोता है।

जैसे- लोग अंधे नहीं हैं। लोग ठीक ही कहते हैं ।

कभीकभी  ‘सब लोग’ का प्रयोग बहुवचन में होता है। ‘लोग’ कहने से कुछ व्यक्तियों का और  ‘सब लोग’ कहने सेअनगिनत और अधिकव्यक्तियोंका बोध होता है।

जैसे- सब लोगों का ऐसा विचार है। सब लोग कहते हैं की गांधी महापुरुष थे।

  • व्यक्ति वाचक संज्ञा और क्रिया का मेल – यदि व्यक्तिवाचक संज्ञा कर्त्ता हैतो उसके लिंग और वचन के अनुसारक्रिया के लिंग औरवचन होंगे।

जैसे – काशी सदा भारतीय संस्कृति का केंद्र रही है। यहाँ कर्त्ता स्त्रीलिंग है।  पहले कलकत्ता भारत की राजधानी था। यहाँ कर्त्ता पुलिंग है। उसका ज्ञान ही उसकी पूंजी था। यहाँ कर्त्ता पुलिंग है।

  • समयसूचक समुच्चय का प्रयोग – “तीन बजे हैं। आठ बजे हैं।” इन वाक्यों में तीन और आठ बजने का बोध समुच्चयमें हुआ है।
  • पर’ और ‘ऊपर’ का प्रयोग – ‘ ऊपर और ‘पर’ व्यक्ति और वस्तु दोनों के साथ प्रयुक्त होते हैं। किन्तु ‘पैर’ सामान्यऊंचाई का औरऊपर’  विशेषऊंचाई का बोधक है।

जैसे-  पहाड़ के ऊपर एक मंदिर है।  इस विभाग में मैं सबसे ऊपर हूँ।

  • हिंदी में ‘ऊपर ‘ कीअपेक्षा ‘पर’ का व्यवहार अधिक होता है।

जैसे – मुझपर कृपा करो । छत पर लोग बैठे हैं।  गोप पर अभियोग है।  मुझपर तुम्हारे एहसान हैं।

  • बाद’ और ‘पीछे’ का प्रयोग  – यदि काल का अंतर बताना हो, तो ‘बाद’ का और यदि स्थान का अंतर सूचित करना हो, तो ‘पीछे’ का प्रयोग होता है।

जैसे –  उसके बाद वह आया- काल का अंतर।   मेरे बाद इसका नम्बर आया- काल का अंतर ।  उसका घर पीछे छूट गया – स्थान का अंतर। गाडी पीछे रह गयी  – स्थान का अंतर।  मैं उससे बहुत पीछे हूँ – स्थान का अंतर।

  • नएनयेनईनयी का शुद्ध प्रयोग– जिस शब्द का अंतिम वर्ण ‘या’ है उसका बहुवचन ‘ये’ होगा। ‘नया’ मूल शब्द है  , इसका बहुवचन ‘नए’ और स्त्रीलिंग  ‘नयी’ होगा।
  • गएगईगयेगयी का शुद्ध प्रयोग– मूल शब्द  ‘गया’ है। उपरिलिखित नियम के अनुसार ‘गया’ का बहुवचन ‘गये’ और स्त्रीलिंग ‘गयी ‘ होगा।
  • हुये,हुए,हुयी,हुई का शुद्ध प्रयोग– मुल शब्द ‘हुआ’ है । एकवचन में इसका बहुवचन होगा ‘हुए’; हुये नही । ‘हुए’ का स्त्रीलिंग ‘हुई’ होगा ; हुयी नही ।

जिस शब्दरूप में लिंग, वचन, पुरुष, कारक इत्यादि के कारण कोई विकार पैदा नहीं होता, उसे अव्यय कहते हैं. वस्तुतः किसी भी स्थिति  में अव्यय का रूप वैसे – का – वैसे बना रहता है.

जैसे – धीरे- धीरे, यहाँ, वहां, जब, तब, इसलिए, किन्तु, परन्तु, वह, आह, कब, इत्यादि.

अव्यय के भेद

  • क्रियाविशेषण
  • सम्बन्धबोधक
  • समुच्चयबोधक
  • विस्मयादिबोधक

क्रियाविशेषण

क्रिया की विशेषता बताने वाले अव्यय को क्रिया विशेषण कहते हैं. जैसे – यहाँ, वहां, अभी, जल्दी बहुत इत्यादि.

संयुक्त क्रिया विशेषण – संज्ञाओं, क्रिया क्रिया विशेषणों एवं अनुकरणमूलक शब्दों की द्विरुक्ति;  संज्ञाओं के एवं भिन्न क्रियाविशेषणों के मेल से, अव्यय के प्रयोग से था क्रियाविशेषणों की पुनरुक्ति के बीच ‘न’ आने से बने क्रियाविशेषण को संयुक्त क्रियाविशेषण कहते हैं. जैसे – घर घर, फटाफट, दिन– रात, जहाँ-तहाँ प्रतिदिन, कुछ न कुछ इत्यादि.

अर्थ के आधार पर क्रियाविशेषण के भेद चार हैं

स्थानवाचक

  • स्तिथिवाचक- यहाँ,वहां, बाहर, भीतर इत्यादि.
  • दिशावाचक- इधर , उधर, दायें, बाएं इत्यादि.

कालवाचक:

  • समयवाचक – अभी, आज, कल, जब, तुरंत, इत्यादि.
  • अवधिवाचक – नित्य, दिन– बाहर, आजकल इत्यादि.
  • बारम्बरतावाचक – प्रतिदिन, कई, बार, हर बार इत्यादि

परिमाणवाचक

  • अधिकताबोधक – बहुत, खूब, अति, खूब इत्यादि.
  • न्यूनताबोधक – कुछ प्रायः, जरा,लगभग इत्यादि.
  • पर्याप्तिबोधक – बस, ठीक, अस्तु, काफी इत्यादि.
  • तुलनाबोधक – काम, अधिक, बढ़कर इत्यादि.
  • श्रेणिबोधक – तिल-तिल, बारी-बारी से, क्रमश: इत्यादि.

रीतिवाचक

निश्चय, अनिश्चय, स्वीकार, कारण, निषेध इत्यादि अर्थों का बोधक – यथासंभव, ऐसे, वैसे, अवशय, ही, भी , इत्यादि

प्रयोग के आधार पर तीन भेद होते हैं

  • साधारण क्रिया विशेषण – वाक्य में स्वतत्र रूप से प्रयुक्त होने वाले क्रिया विेषेशण को साधारण क्रिया विशेषण कहते हैं. जैसे – यहाँ, कब, जल्दी, इत्यादि।
  • संयोजक क्रिया विशेषण – उपवाक्य से समबन्धित क्रिया विशेषण को संयोजक क्रिया विशेषण कहते हैं. जैसे – जहाँ आप पढ़ेंगे, वहाँ मैं भी पढूंगा ( जहाँ, वहाँ ). जब आप कहेंगे तब मैं आऊंगा ( जब, तब )
  • अनुबद्ध क्रिया विशेषण – किसी शब्द के साथ अवधारणा के लिए प्रयुतक्त होने वाले क्रिया विशेषण को अनुबद्ध क्रिया विशेषण कहते हैं. जैसे – तक, भर, तो, भी, इत्यादि।

रुप के आधार पर क्रिया विशेषण के तीन भेद होते हैं.

  • मूल क्रिया विशेषण- बिना किसी अन्य के मेल में आये स्वतंत्र रूप वाले क्रिया विशेषण को मूल क्रिया विशेषण कहते हैं। जैसे – दूर, ठीक, नहीं, फिर , अचानक इत्यादि।
  • यौगिक क्रिया विशेषण – शब्दों में प्रत्यय जोड़ कर बने क्रिया विशेषण को यौगिक क्रिया विशेषण कहते हैं। जैसे – यहाँ तक, मन से , दिल से, वहाँ पर इत्यादि।
  • स्थानीय क्रिया विशेषण – ऐसे क्रिया विशेषण जो बिना रूपांतर के किसी विशेष स्थान में आते हैं,स्थानीय क्रिया विशेषण कहलाते हैं। जैसे – वह अपना सर पढ़ेगा।

सम्बन्ध बोधक

वह अव्यय जो किसी संज्ञा के बाद आकर उसका सम्बन्ध वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ दिखाए सम्बन्ध बोधक कहलाता है।  जैसे – तक, भर, बिना, बाद, द्वारा , लिए , इत्यादि।

प्रयोग के आधार पर सम्बन्ध बोधक के भेद –

  • सम्बद्ध सम्बन्ध बोधक – संज्ञाओं के विभक्तियों के बाद आता है। जैसे – व्यायाम के पहले ( पहले ) पुस्तक के बिना ( बिना ) – दोनों वाक्यों में ” के ” विभक्ति के बाद।
  • अनुबद्ध सम्बन्ध बोधक – संज्ञाओं के विकृत रूप के बाद आता है। जैसे – कई दिनों तक ( तक )  प्याले भर ( भर )   – दिनएवम प्याला के विकृत रूप के बाद।

अर्थ के आधार पर सम्बन्ध बोधक के 13 भेद हैं। 

  • कालवाचक – पूर्व, पहले, बाद, आगे, पीछे , इत्यादि।
  • स्थानवाचक – बहार, भीतर, नीचे, बीच, समीप इत्यादि।
  • सादृश्य वाचक – समान, तरह, भांति , योग्य सा , जैसा इत्यादि।
  • तुलना वाचक – अपेक्षा , बनिस्पत , सामने इत्यादि।
  • दिशा वाचक – तरफ, ओर, पार, आस पास इत्यादि।
  • साधन वाचक – सहारे, द्वारा, जरिये, मारफत इत्यादि।
  • हेतु वाचक – हेतु, लिए, निमित, वास्ते इत्यादि।
  • विषय वाचक – भरोसे, निस्बत, बाबत, लेखे इत्याद।
  • व्यतिरेक वाचक – बिना, सिवा, आलावा, अतिरिक्त इत्यादि।
  • विनिमय वाचक – बदले, एवज, पलटे ,जगह इत्यादि।
  • विरोध वाचक – खिलाफ, विरुद्ध , विपरीत, उलटे इत्यादि।
  • सहचर – साथ, संग, सहित, समेत इत्यादि।
  • संग्रह वाचक – भर, तक, मात्र, प्रयन्त इत्यादि।

व्युत्पत्ति के आधार पर सम्बन्ध बोधक के भेद

  • मूल सम्बन्ध बोधक – जैसे – बिना, पूर्वक, प्रयन्त इत्यादि।
  • यौगिक सम्बन्ध बोधक – जैसे – संज्ञा से बने, लेखे, अपेक्षा, मारफत इत्यादि

समुच्चय बोधक

समुच्चय बोधक ऐसा अव्यय है जो संज्ञा अथवा क्रिया की विशेषता न बताकर एक पद अथवा वाक्य का सम्बन्ध दूसरे पद अथवा वाक्य से जोड़ता है।  जैसे – और, तथा, एवं, अतएव , अतः इत्यादि।

समुच्चय बोधक  के भेद –

  • समानाधिकरण समुच्चय बोधक – मुख्य वाक्यों को जोड़ने वाले अव्ययों अथवा पदों को समानाधिकरण समुच्चय बोधक कहते हैं । जैसे – और , यथा, या , कि इत्यादि।
  • व्यधिकरण समुच्चय बोधक – एक मुख्य वाक्य में एक या अधिक आश्रित वाक्य जोड़ने वाले अव्ययों अथवा पदों को व्यधिकरण समुच्चय बोधक कहते हैं। जैसे – कि, क्योंकि, इसलिए, जो इत्यादि।

विस्मयादिबोधक –
हर्ष, शोक, आश्चर्य , तिरस्कार आदि के भाव को सूचित करने वाले अव्यय को विस्मयादिबोधक कहते हैं। जैसे – आह!, अहा !, वाह !, छीः!, अरे इत्यादि।

विस्मयादिबोधक के भेद –
हर्षबोधक – अहा!, शाबाश!, वाह -वाह!, बहुत खूब इत्यादि।
शोकबोधक – आह !, हाय !, ओह ! इत्यादि।
आश्चर्य बोधक – क्या! ऐं ! हैं !
अनुमोधन बोधक – ठीक!, अच्छा !, हाँ-हाँ ! इत्यादि।
तिरस्कार बोधक – छीः !,धिकः !,दुर ! इत्यादि।
स्वीकार बोधक – हाँ !, जी !, जी हाँ ! इत्यादि।
सम्बोधन बोधक – रे !, अरे!, अजी!, हे! इत्यादि

निपात –
निपात शुद्ध अव्यय नहीं है; क्योंकि संज्ञाओं, विशेषणों, सर्वनामों आदि में जब अव्ययों का प्रयोग होता है, उनका अपना अर्थ होता है, पर निपातों में ऐसा नहीं होता। निपातों का प्रयोग निश्चित शब्द, शब्द-समुदाय या पुरे वाक्य को अन्य भावार्थ प्रदान करने के लिए होता है। इसके अतिरिक्त, निपात सहायक शब्द होते हुए भी वाक्य के अंग नहीं हैं। पर वाक्य में इनके प्रयोग से उस वाक्य समग्र अर्थ व्यक्त होता है। साधारणतः निपात अव्यय ही है। हिन्दी में अधिकतर निपात शब्द समूह के बाद आते हैं, जिनको वे बल प्रदान करते हैं।

जैसे – क्या वह खाना नहीं खा रहा है। ( “क्या” का प्रयोग यहाँ पर निपात की तरह हुआ है। )

निपात के प्रकार –

  • स्वीकार्य निपात – हाँ, जी, जी हाँ
  • नकारार्थक निपात – नहीं, जी नहीं
  • निषेधात्मक निपात – मत
  • प्रश्नबोधक निपात – क्या ? , न
  • विस्मयादि बोधक निपात – क्या, काश , काश कि
  • बलदायक/ सीमा बोधक निपात – तो, ही, तक, पर, सिर्फ
  • तुलनबोधक निपात – सा
  • अवधारण बोधक निपात – ठीक, लगभग, तकरीबन
  • आदरबोधक निपात – जी

कारक ( Case )

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) क्रिया से सम्बन्ध सूचित हो, उसे ‘कारक’ कहते हैं. जैसे-

कारक के भेद

हिंदी में कारक आठ हैं और कारकों के बोध के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्यय (चिन्ह) लगाये जाते हैं, उन्हें व्याकरण में ‘विभक्तियाँ’ कहते हैं.

कारक   विभक्तियाँ
कर्त्ता 0, ने
कर्म 0, को
करण से
सम्प्रदान को, के लिए
अपादान से (अलगाव के अर्थ मेँ )
सम्बन्ध का, की, के, रा, री, रे
अधिकरण में, पर
सम्बोधन हे, अहो, अजी, अरे

कर्त्ताकारक

वाक्य में जो शब्द काम करनेवाले के अर्थ में आता है,उसे ‘कर्त्ता’ कहते हैं. जैसे – ‘मोहन खाता है’.

कर्मकारक

वाक्य में क्रिया का फल जिस  शब्द पर पड़ता है, उसे कर्म कहते हैं. जैसे – मैंने हरि को बुलाया.

करणकारक

वाक्य में जिस शब्द से क्रिया के सम्बन्ध का बोध हो,उसे करणकारक कहते हैं. जैसे – वह कुल्हाड़ी से वृक्ष काटता है.

सम्प्रदानकारक

जिसके लिए कुछ किया जाये या जिसको कुछ दिया जाये, इसका बोध करानेवाले शब्द के रूप को सम्प्रदानकारक कहते हैं. जैसे – हरी मोहन को मारता है.

अपादानकारक

संज्ञा के जिस रूप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट होता है,उसे अपादनकारक कहते हैं.जैसे – हिमालय से गंगा निकलती है.

संबंधकारक

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी अन्य शब्द के साथ सम्बन्ध या लगाव प्रतीत हो, उसे संबंधकारक कहते हैं.जैसे – राम की किताब, श्याम का घर.

अधिकरणकारक

क्रिया या आधार को सूचित करनेवाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरणकारक कहते हैं. जैसे – तुम्हारे घर पर चार आदमी है.

सम्बोधनकारक

संज्ञा के जिस रूप से किसी के पुकारने या संकेत करने का भाव पाया जाता है, उसे सम्बोधनकारक कहते हैं. जैसे – हे भगवान !

किसी वस्तु या वय्क्ति की जाति बोध कराने वाली संज्ञा के रुप को लिंग कहते हैं।जैसे – लड़का ( पुलिंग ) ,लड़की ( स्त्रीलिंग ) इत्यदि ।

लिंग– निर्णय के प्रमुख नियम:-

(पुलिंग शब्दों की पहचान :-

  1. मनुष्य और बड़े पशुओं में नर. जैसे – पुरुष,नर, घोडा, लड़का आदि.
  2. संस्कृत के अकारांत तत्सम शब्द. जैसे – अध्यक्ष, अध्याय, कण आदि.
  3. छोटे पक्षियों, कीड़ो,आदि के नाम शब्द की जाति व्यवहार के आधार पर. जैसे- कौआ, सांप, मच्छर आदि.
  4. द्वंद्वसमास के प्राणीवाचक शब्द. जैसे – माँ-बाप, नर-नारी आदि.
  5. अप्राणीवाचक संज्ञाओं के रूप के आधार पर. जैसे– आम, अनार, चन्द्र आदि.
  6. आ, आव, न, प्, आवा अथवा पण से अंत होने वाली हिंदी की भाववाचक संज्ञाएँ. जैसे – बुढ़ापा, मोटापा, बचाव आदि.
  7. वे संज्ञाएँ जिनके अंत में आकर हो. ‘इया’ प्रत्यय को छोड़कर. इसमें तत्सम शब्द भी नहीं आते. जैसे -बच्चा, छटा, कपडा आदि.

(स्त्रीलिंग शब्दों की पहचान:-

  1. आ, ई, अथवा उ से अंत होने वाले तत्सम शब्दो। जैसे – दया, कृपा, प्रार्थना आदि.
  2. अ अथवा न से अंत होने वाली संस्कृतेतर भाववाचक संज्ञाएँ. जैसे – प्रकार, चमक, समझ आदि.
  3. ता, आवट तथा आहट प्रत्यय से अंत होने वाली भाववाचक संज्ञाएँ. यथा -झंझट, सजावट, घबराहट आदि.
  4. तत्सम को छोड़कर वे संज्ञाएँ जिनके अंत में ई, ऊ,इया, टीअथवा स हो.
    1. ई से अंत होने वाली संज्ञाएँ – धोती,साड़ी, चीटीं आदि.
    2. ऊ से अंत होने वाली संज्ञाएँ – लू,गेरू, बाल आदि.
    3. इया से अंत होने वाली संज्ञाएँ – बुढ़िया,खटिया,डिबिया, नथिया आदि.
    4. ख से अंत होने वाली संज्ञाएँ – राख, आँख, सीख आदि.
    5. त से अंत होने वाली संज्ञाएँ – रात, बात, आंत आदि.
    6. स से अंत होने वाली संज्ञाएँ – घास, आस, सांस आदि.
  • इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं. पानी, मोती, घी, हाती, पाख, विकास, निकास आदि.
  • नदियों और तिथियों के नाम. जैसे-
    1. नदियां – यमुना, गोदावरी, कावेरी, भागीरथी, आदि.अपवाद – सोन, दामोदर, सिंधु तथा ब्रम्हपुत्र।
    2. तिथियाँ– प्रतिपदा, दितिया, दूज, तृतीया, तीज, चतुर्थी, चौथ  आदि.

वचन ( Number)

संज्ञा, सर्वनाम,विशेषण तथा क्रिया के संख्याबोधक रूप को वचन कहते हैं. जैसे – काला कुत्ता ( एकवचन), काले कुत्ते (बहुवचन) इत्यादि.

वचन के भेद

  1. एकवचन –विकारी शब्द के जिस व्यक्ति अथवा वस्तु का बोध हो उसे एक वचन कहते हैं. जैसे – लड़का, कुत्ता, मैं, उजला इत्यादि.
  2. बहुवचन –विकारी शब्द के जिस रूप से एक से  ज्यादा वस्तुओं अथवा व्यक्तिओं का बोध हो उसे बहुवचन कहते हैं. जैसे -लड़के , कुत्ते, हम, खाते हैं इत्यादि.

सर्वनाम

उस  विकारी शब्द को ‘सर्वनाम’ कहते हैं जो पूर्व में प्रयुक्त संज्ञा के बदले आता है. जैसे – सीता एक अच्छी लड़की है.

सर्वनाम के भेद

सर्वनामों की संख्या

सर्वनामों की संख्या 11 (ग्यारह) है. – मैं, तू, आप,यह,वह, जो, सो, कोई, कौन, कुछ तथा

सर्वनाम के भेद :-

प्रयोग के अनुसार सर्वनाम के छः भेद और तीन उपभेद हैं. वे इस प्रकार हैं –

पुरुषवाचक सर्वनाम – ये पुरुषों (पुरुष अथवा स्त्री) के नाम के बदले आते हैं. इनके तीन भेद हैं-

  1. उत्तम पुरुष– मैं,हम, (‘मैं’ का बहुवचन रूप)
  2. मध्यम पुरुष– तू, आप, तुम (‘तू’ का बहुवचन)
  3. अन्य पुरुष– वह, वे (‘वह’ का बहुवचन), यह, ये (‘यह’ का बहुवचन)

निजवाचक सर्वनाम – ये वे सर्वनाम हैं जिनका प्रयोग स्वयं के लिए होता है, जैसे – आप, स्वयं,स्वत:, अपने आप, खुद इत्यादि ।

निश्चयवाचक सर्वनाम -जिससे वक्ता के निकट अथवा दूर की वस्तु के निश्चय का बोध हो, वह निश्चयवाचक सर्वनाम है.  जैसे – यह, वह.

अनिश्चयवाचक सर्वनाम – निश्चित वस्तु का बोध न करने वाला सर्वनाम अनिश्चयवाचक सर्वनाम है. जैसे – कोई, कुछ.

सम्बन्धवाचक सर्वनाम – जिस सर्वनाम से किसी दूसरे सर्वनाम से सम्बन्ध स्थापित किया जाये, उसे सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहते हैं. जैसे – जो, सो.

प्रश्नवाचक सर्वनाम – प्रश्न करने के लिए प्रयुक्त होने वाले सर्वनाम को प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं. जैसे कौन, क्या.

वाक्य

मनुष्य के विचारों को पूर्णता से प्रकट करनेवाले  पदसमूह को वाक्य कहते हैं।

वाक्य में आकांक्षा, योग्यता और काम

वाक्य  के एक पद को  सुनकर दूसरे पद को सुनने या जानने की जो स्वाभाविक उत्कंठा जागती है, उसे आकांक्षा कहते हैं ।जब वाक्य का प्रत्येक पद या शब्द अर्थबोधन में सहायक हो, तो समझना चाहिए की वाक्य में योग्यता वर्तमान है । वाक्यों में प्रयुक्त पदों या शब्दों की विधिवत स्थापना को क्रम  कहते हैं।

रचना की दृष्टि से वर्गीकरण :- 

सरल वाक्य

जिस वाक्य में एक क्रिया होती है और एक कर्ता होता है, उसे साधारण या सरल वाक्य कहते हैं। इसमें एक उद्देश्य और एक विधेय रहते हैं । जैसे – बिजली चमकती है, पानी बरसा इत्यादि ।

 मिश्र वाक्य

जिस वाक्य में एक साधारण वाक्य के अतिरिक्त उसके अधीन कोई दूसरा अंगवाक्य हो, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जिस वाक्य में मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय के अलावा एक या अधिक  समापिका क्रियाएँ हों, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं । जैसे – वह कौन – सा मनुष्य है, जिसने महाप्रतापी राजा भोज का नाम न सुना हो।

संयुक्त वाक्य

संयुक्त वाक्य उस वाक्य – समूह को कहते हैं, जिसमे दो या दो अधिक सरल वाक्य अथवा मिश्र वाक्य अव्ययों द्वारा संयक्त हो। इस प्रकार के वाक्य लम्बे और आपस में उलझे होते हैं। जैसे – मैं रोटी खाकर लेटा कि पेट में दर्द होने लगा, और दर्द इतना बढ़ा की तुरंत डॉक्टर को बुलाना पड़ा।

अर्थ की दृष्टि से वर्गीकरण :-

अर्थ के अनुसार वाक्य के आठ भेद है।

  • प्रश्नवाचक वाक्य– जिससे किसी प्रकार के प्रश्न किये जाने का बोध हो। जैसे – क्या तुम खा रहे हो ? तुम्हारा नाम क्या है?
  • आज्ञावाचक वाक्य– जिससे किसी तरह की आज्ञा का बोध हो। जैसे – तुम खाओ। तुम पढ़ो।
  • निषेधवाचक वाक्य– जिससे किसी बात के न होने का बोध हो । जैसे – सरल वाक्य – हमने खाना नहीं खाया। मिश्र  वाक्य – मैंने खाना नहीं खाया, इसलिए मैंने फल नहीं खाया । संयुक्त  वाक्य – मैंने भोजन नहीं किया और इसलिए मेरी भूख नहीं मिटी।
  • विधिवाचक वाक्य– जिससे किसी बात के होने का बोध हो । जैसे – सरल वाक्य– हम खा चुके । मिश्र वाक्य– मैं खाना खा चूका, तब वह आया। संयुक्त वाक्य – मैंने खाना खाया और मेरी  भूख  मिट गयी।
  • विस्मयवाचक वाक्य– जिससे आश्चर्य, दुःख या सुख    का बोध हो। जैसे  – ओह! मेरा सर फटा जा रहा है।
  • सन्देहवाचक वाक्य– जिससे किसी बात का संदेह प्रकट हो। जैसे – उसने खा लिया होगा। मैंने कहा होगा।
  • इच्छावाचक वाक्य– जिससे किसी प्रकार की इच्छा या शुभकामना का बोध हो। जैसे तुम अपने कार्य में सफल रहो।
  • संकेतवाचक वाक्य– जहाँ एक वाक्य दूसरे की संभावना पर निर्भर हो। जैसे- पानी न बरसता तो धान सुख जाता। यदि तुम  खाओ तो मैं भी खाऊँ।

वाक्य रचना के कुछ सामान्य नियम

वाक्य को सुव्यवस्थित और संयत रूप देने को व्याकरण में पदक्रम कहते हैं। निर्दोष वाक्य लिखने के कुछ नियम है। इनकी सहायता से शुद्ध वाक्य लिखने का प्रयास किया जा सकता है। सुन्दर वाक्यों की रचना के लिए (क्रम (अन्वय और ()प्रयोग से सम्बन्ध कुछ सामान्य नियमों का ज्ञान आवश्यक है।

क्रम

किसी वाक्य के सार्थक शब्दों को यथास्थान रखने की क्रिया को क्रम अथवा पदक्रम कहते हैं। इसके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं।

  1. हिंदी वाक्य के आरम्भ में कर्त्ता , मध्य में क्रम और अंत में क्रिया होनी चाहिए। जैसे – मोहन ने भोजन किया।यहाँ कर्त्ता मोहन कर्म भोजन और अंत में क्रिया है
  2. उदेश्य या कर्त्ता के विस्तार को कर्त्ता के पहले और विधेय या क्रिया के विस्तार को विधेय के पहले रखना चाहिए। जैसे – अच्छे लड़के धीर – धीरे पढ़ते हैं।
  3. कर्त्ता और कर्म के बीच अधिकरण, अपादान, सम्प्रदान और करण कारक क्रमशः आते हैं। जैसे – मुरारी ने घर में (अधिकरण) आलमारी से (अपादान) श्याम के लिए (सम्प्रदान) हाथ से (करण) पुस्तक निकाली।
  4. सम्बोधन आरम्भ में आता है। जैसे – हे प्रभु, मुझपर दया करें।
  5. विशेषण विशेष्य या संज्ञा के पहले आता है। जैसे- मेरी उजली कमीज कहीं खो गयी।
  6. क्रिया विशेषण क्रिया के पहले आता है। जैसे – वह तेज दौड़ता है।
  7. प्रश्न वाचक पद या शब्द उसी संज्ञा के पहले रखा जाता हैं, जिसके बारे में कुछ पूछा जाये। जैसे – क्या मोहन सो रहा है ?

टिप्पणी – यदि संस्कृत की तरह हिंदी में वाक्यरचना के साधारण क्रम का पालन न किया जाये, तो इससे कोई क्षति अथवा अशुद्धि नहीं होती। फिर भी, उसमे विचारों का एक तार्किक क्रम ऐसा होता है, जो एक विशेष रीति के अनुसार एक – दुसरे के पीछे आता है।

क्रिया ( Verb )

जिस शब्द से किसी कार्य का होना अथवा करना समझा जाये अथवा जाहिर हो, उसे क्रिया कहते हैं. जैसे – खाना, पीना, आना, पढ़ना इत्यादि.

धातु

जिस मूल शब्द से क्रिया बनती है,उसे ‘धातु’ कहते हैं.

क्रिया के भेद

  1. सकर्मक क्रिया– ‘सकर्मक क्रिया’ वह है जिसके साथ कर्म आया हो अथवा कर्म की सम्भावना हो. जैसे – राधा मिठाई खाती है.
  2. अकर्मक क्रिया –जिस क्रिया के साथ कर्म न हो तथा जिसका फल कर्त्ता पर ही पड़े,उसे  ‘अकर्मक क्रिया’ कहते हैं. जैसे – सीता रोती  है.

क्रिया के अन्य भेद

सहायक क्रिया– यह मुख्य क्रिया के अर्थ को स्पष्ट करने में सहायक होती है. जैसे – सीता पढ़ती है.

 पूर्व कालिक क्रिया – जब कर्त्ता एक क्रिया पूरी कर उसी क्षण दूसरी क्रिया शुरू कर देता है,तब पहली  क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं. जैसे – वह खाकर स्कूल गया.

द्विकर्मक क्रिया– दो कर्मवाली क्रिया को द्विकर्मक क्रिया कहते हैं. जैसे – रमेश अपने भाई को कलम देता है.

नामबोध क्रिया – संज्ञा अथवा विशेषण के साथ क्रिया जोड़ने से बनी संयुक्त क्रिया को ‘नामबोध क्रिया’ कहते हैं. जैसे -रक्त खौलना

संयुक्त क्रिया – दो क्रियाओं के मेल से बनी क्रिया को संयुक्त क्रिया कहते हैं. जैसे – वर्षा होने लगी.

संयुक्त क्रिया के भेद – इसके 11 भेद हैं.

  • आरम्भ बोधक
  • समाप्ति बोधक
  • अवकाश बोधक
  • अनुमति बोधक
  • नित्यता बोधक
  • आवश्यकता बोधक
  • निश्चय बोधक
  • इच्छा बोधक
  • अभ्यास बोधक
  • शक्ति बोधक
  • पुनरुक्त संयुक्त क्रिया
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