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Nov 12, 2015
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नीलवर्ण सियार

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किसी जंगल में चंडरव नामक एक सियार रहता था | एक दिन वह भूख से व्याकुल भटकता हुआ लोभ के कारण समीप के नगर में पहुँच गया | उसको देखते ही नगरवासी कुत्ते उसके पीछे पद गए | अपने प्राण बचाने के लिए सियार जब भागा तो वह धोबी के घर में घुस गया | घर के अन्दर एक बड़ी-सी नांद ( कड़ाहीनुमा मिट्टी का एक बड़ा बर्तन ) में धोबी ने नील घोलकर नीला पानी बनाया हुआ था | नांद नीले पानी से लबालब भरी थी | सियार डरा हुआ अन्दर घुसा तो उस नाद में जा गिरा | उसको नाद में कूदते देख कुत्ते वहां से भरा गए |

सियार जब उस नाद से बाहर निकला तो उसका सारा शरीर नीला हो गया था | नीले रंग में रंगा हुआ सियार जब वन में पहुंचा, तो सभी जंगली जानवर उसे देखकर चकित रह गए | वैसे रंग का जानवर उन्होंने आज तक नहीं देखा था | उसे विचित्र जीव समझकर शेर, बाघ, चीते भी डर-डरकर जंगल में इधर-उधर भागने लगे | वे सब सोचने लगे, न जाने इस विचित्र पशु में कितना सामर्थ्य हो | इससे दूर रहना ही अच्छा है |

सियार ने जब सब पशुओं को डरकर भागते देखा, तो उन्हें बुलाकर बोला- “भाइयों, तुम लोग मुझसे डर कर क्यों भाग रहे हो ? मैं आप लोगों की रक्षा के लिए यहाँ आया हूँ | त्रिलोक के राजा ब्रह्ममा ने मुझे आज ही कहा था की आजकल चौपायो का कोई राजा नहीं है | सिंह, मृग आदि सब राजा हीन हैं | आज मैं तुम्हें उन सबका राजा बनाकर भेजता हूँ | तू  वहां जाकर सबकी रक्षा कर | इसलिए मैं यहाँ आया हूँ | मेरी छत्रछाया में सब पशु आनदं से रहेंगे | मेरा नाम कुकुद्द्रुम है |”

यह सुनकर शेर, बाघ आदि पशुओं ने सियार को अपना राजा मान लिया और बोले – “स्वामी! हम आपके दास हैं, आज्ञापालक हैं, आगे से हम आपकी आज्ञा का ही पालन करेंगे |

सियार ने राजा बनने के बाद शेर को अपना प्रधानमंत्री, बाघ को अंग रक्षक और भेड़िये को संतरी बनाया, लेकिन अपने स्वजातीय सियारों से उसने बात तक न की | उनको दूर ही रखा और अपने राज्य से बाहर निकाल दिया |

उसके राज्य में शेर आदि छोटे-छोटे जानवरों को मार कर लाते और सियार को भेंट कर देते | सियार उनमें से कुछ भाग खाकर शेष अपने सेवकों में बाट देता था |

इस प्रकार सियार को राज्य करते हुए कई दिन बीत गए | एक दिन वह सभा में बैठा किसी गहन विषय पर विचार कर रहा था कि तभी दूर वन में रहने वाले सियार सहसा समवेत स्वर में ‘हुआँ – हुआँ’ की आवाजें करने लगे |

उन आवाजों को सुनकर चंडरव नाम का वह सियार इतना प्रसन्न हुआ कि स्वयं भी हुआँ – हुआँ करने लगा | वह यह बात बिलकुल ही भूल गया कि अब वह यहाँ का राजा बना बैठा था |

शेर, बाघ आदि पशुओं ने जब उसकी किलकारियां सुनी तो वे समझ गए कि यह चंडरव ब्रह्मा का दूत नहीं, बल्किएक मामूली सियार है | कुछ देर तक सभी जानवर अपनी नासमझी पर लज्जित हो मुंह नीचा किये बैठे रहे, लेकिन फिर उनके स्वाभिमान ने जोर मारा शेर और बाघ  चंडरव पर झपटे और उसके शरीर को चीर-फाड़कर रख दिया |

यह कथा सुनाकर दमनक पिंगलक से बोला- “स्वामी! इसीलिए कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने आत्मियजानो की अवहेलना करता है | उसकी ऐसी ही दशा होती है | इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपने सजातीय बंधुओं की अवहेलना न करें और संजीवक से पीछा छुड़ा लें |”

पिंगलक को दमनक की बात का विश्वास नहीं हो रहा था | उसने सन्देहपूर्वक पूछा – “दमनक! अपनी बात को तुम्हें प्रमाणित करना होगा | इसका क्या प्रणाम है कि संजीवक मुझे द्वेष-भाव से देखता है ?”

दमनक बोला- “इसका प्रमाण आप स्वयं अपनी आँखों से देख लेना | आज सुबह उसने मुझसे यह भेद प्रकट किया है कि कल वह आपका वध करेगा | कल यदि आप उसे अपने दरबार में लड़ाई के लिए तैयार देखें, उसकी आँखें लाल हो, होंठ फड़फड़ाते हों, एक ओर बैठकर आपको क्रूर-वक्र दृष्टि से देख रहा हो, तब आपको मेरी बात पर स्वयं विश्वास हो जाएगा |”

पिंगलक को संजीवक के विरुद्ध उकसाने के बाद दमनक संजीवक के पास आया | संजीवक ने जब उसे घबराते हुए आते देखा तो पूछा- “मित्र! क्या बात है, तुम बहुत दिनों बाद इधर आये ? और कुछ घबराए हुए से भी लग रहे हों ? सब कुशल तो है न ?”

दमनक बोला- “राजसेवकों के कुशल का क्या पूछना ? उनका चित्त सदा अशांत रहता है | स्वेच्छा से वे कुछ भी नहीं कर सकते | निःशंक होकर एक शब्द भी नहीं बोल सकते | इसलिए सेवावृति को सब वृत्तियों से अधम कहा गया है |”

यह सुनकर संजीवक बोला- “मित्र, आखिर बात क्या है ? आप इतने व्यग्र क्यों हैं ? आप इतने व्यग्र क्यों हैं ? तुम्हारे मन में कोई विशेष बात है तो उसे निःसंकोच कहो | साधारणतया राजसम्बन्धियों को सब कुछ गुप्त रखना चाहिए, लेकिन मेरे तुम्हारे बीच कोई पर्दा नहीं है | तुम बेखटके अपने दिल की बात मुझको कह सकते हो |”

दमनक बोला- “मित्र, बात यह है कि पिंगलक के मन में तुम्हारे प्रति पाप-भावना आ गई है | आज उसने मुझे बिलकुल एकांत में बुलाकर कहा है कि कल सुबह ही वह तुम्हें मार कर अन्य माँसाहारी दमनक की बात सुनकर संजीवक सन्न रह गया | कुछ क्षण के लिए तो उसे मूच्छी-सी आ गयी |फिर जब चैतन्य हुआ तो नफरत भरे स्वर में बोला- “राजसेवा सचमुच बहुत धोखे का काम है | राजाओं के सीने में दिल होता ही नहीं है | मैंने पिंगलक से मित्रता करके बहुत मूर्खता की है | मैं भूल गया था कि मैत्री हमेशा समान बल और समान शील वाले से ही करनी चाहिए | निश्चय ही पिंगलक को उसके पास रहने वाले जीवों ने इर्ष्यावश भड़काया है तभी तोवह मेरी जान लेने पर उतारू हो गया है |”

दमनक बोला- “ मित्रवर! यदि यही बात है, तो मीठी बातों से अब पिंगलक को प्रसन्न किया जा सकता है | क्योंकि राजा लोग प्रायः मीठी-मीठी बातों से ही खुश होते हैं |”

संजीवक ने कहा- “नहीं मित्र, यह उपाय सच्चा उपाय नहीं है | एक बार तो मैं राजा को प्रसन्न कर लूँगा, लेकिन उसके पास वाले कट-कपटी लोग फिर किन्हीं दूसरे झूठे बहनों से उसके मन में मेरे लिए जहर भर देंगे और मेरे वध का उपाय करेंगे | ठीक उसी तरह, जिस तरह एक गीदड़ और कौवे ने मिल कर एक ऊंट को सिंह के हाथों मरवा दिया था |”

दमनक ने पूछा- “वह किस प्रकार ?”

तब संजीवक ने दमनक को ऊंट, कौवे और सिंह की कथा सुनाई |

लेखक – विष्णु शर्मा

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पंचतन्त्र

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