साहित्य समाज का दर्पण

किसी भी लिखित अभिव्यक्त का नाम साहित्य है। मनुष्य और समाज तथा उसकी मान्यतायें परिवर्तन होती रही है। और इसी के अनुसार साहित्य का स्वरूप भी बदलता रहा है, न तो मनुष्य न…

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पैरेंट्स डे

आज पैरेंट्स डे है ना अरे वाह कितना अच्छा दिन है। आज तो माँ बाबुजी के लिए एक मिठाई का पैकेट ले लेता हूं । ओर क्या लूं कपड़े भी ले लूं क्या…

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घर छोड़ आये

वो घर,वो मकान और वो गांव छोड आये शहर की चमक में वो चाँद छोड आये निकल आये दूर सिक्के कमाने की चाहत में और ऊगता हुआ सोना खेत मे ही छोड आये

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अशुद्ध मैं नही तुम हो

"अशुद्ध में नही, तू है!" जो मेरे खून के दाग है, तेरे आने वाले वंश का सबूत है, अशुद्ध मैं नही, तू है! जो आज मंदिर नही जाती मैं, वजह तू है, जो…

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एक मजदूर हूँ

मे एक गरीब मजदूर हूँ, मे भी तो इंसान हूँ भूखा हूँ प्यासा हूँ मे बेसहारा हूँ ग़मो का मरा हूँ मे किसी का बेटा हूँ किसी का बाप हूँ मे किसी का…

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कोरोना से जीतेंगे:कुमार किशन कीर्ति

घर में रहकर स्वच्छता को अपनाकर,सामाजिक दूरी का पालन करेंगे हा,हम कोरोना से जीतेंगेअफवाहों से बचकर कोरोना फाइटर्स की सलाह मानकर,समाज और देश को सुरक्षित करेंगे जी हाँ, हम कोरोना से जीतेंगेहम तब…

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जमीन से स्वर्ग तक की यात्रा

बोगनवेलिया के बैंगनी फूल और हरे कांटों के झाड़ नीला आसमान नीली नदी नीले पहाड़ और नीला यह जहां आज इस सुनहरी धरती पर प्रकृति की छटा कर रही जमीन से स्वर्ग तक…

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जीवन के आखिरी चरण में

कोमल बिस्तर कोमल ख्वाब कोमल मन कोमल साथ जीवन के यह शुरुआती कोमल पल जीवन भर या जीवन के आखिरी चरण में क्या मिल पायेंगे सकल। मीनल

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क्या वह मुझे

मेरा बच्चा और मैं एक ही सिक्के के दो पहलू जैसे हैं मेरा बेटा मेरे आकार और प्रकार का एक छोटा रूप है हमारे नाम अलग हैं लेकिन हम एक ही हैं हमारा…

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Home delivery (कहानी)

एक महिला ने किराने वाले को फोन लगाया। बड़े विनम्र स्वर में बतलाया - हेल्लो, किराने वाले भैया, मैने सुना है आप, Home Delivery करवा रहे हो। किराने वाला बोला - जी हां,…

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जुमलों की जलेबी …!!

देश में चल रही आश्वासनों की आंधी पर पेश है खांटी खड़गपुरिया की चंद लाइनें .... जुमलों की जलेबी ....!! तारकेश कुमार ओझा बकलौली की बूंदी राहत के रसगुल्ले जुमलों की जलेबी आश्वासनों…

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भूख की जंग

कोरोना का कहर हम सह भी लें। भूख के जलाल को कैसे सहें।। निकल पड़ें हैं सुनसान राहों पर। खाने की सुध न रहने का ठिकाना।। बीवी बच्चों के साथ निकल पड़ा हूं।…

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हा, मैं मजदूर हूँ

हा,मैं मजदूर हूँ कड़ी मेहनत करता हूँ, पसीना बहाता हूँ धूप,वर्षा,शीत से लड़ता हूँ हा, मैं मजदूर हूँ मजदूरी करना मेरा काम है मेहनत से रोटी खाना मेरा धर्म है, राष्ट्र निर्माण में…

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एक चोरी की कविता

सुनो दोस्तों...! मैंने एक कविता लिखी है, पर सच बताऊँ...!! लिखी नहीं, चुराई है...॥ भटकते विचारों से... किताबों से, अख़बारों से... रोज़ समाचारों से... थोड़ी-थोड़ी चुराई है...। दोस्तों लिखी नहीं......॥ कुछ यहाँ से,…

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मजदूर की मंजिल …!!

प्रवासी मजदूरों की त्रासदी पर पेश है खांटी खड़गपुरिया की चंद लाइनें .... मजदूर की मंजिल ....!! तारकेश कुमार ओझा ---------------------------- पत्थर तोड़ कर सड़क बनाता है मजदूर फिर उसी सड़क पर चलते…

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