सौतन

अल्मोड़ा का मार्ग बहुत सुन्दर और मनमोहक है। वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारते हुए मन अनायास ही कविता करने लगता है क्योंकि वहाँ की प्राकृतिक सुषमा विधाता की बहुत सुन्दर कविता जान…

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पत्थर

“अभी और कितना चलना है?” “अभी तो चढ़ाई शुरू हुई है। अभी तो बहुत है। पूरे चौदह किलोमीटर है। अभी तो केवल आधा किलोमीटर ही चढ़े हैं।....क्या थक गईं?” “हाँ...चलो...कोई बात नहीं... तुम…

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वीज़ा

“हैलो...हाँ बेटा कैसे हो?” “मैं ठीक हूँ माँ...तुम कैसी हो?” “मैं भी ठीक हूँ बेटा...और शिल्पी और चीकू कैसे हैं?” “सब ठीक हैं माँ, तुम्हारी याद आ रही थी।” आवाज़ में उदासी छा…

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सुलझे गाँठ

प्रेम का धागा नहीं टूटता ..... जब तक उसमें शक का दीमक या अविश्वास का घुन ना जुड़ता ..... खोखला होगा तभी तो टूटेगा मैं जब कढ़ाई या बुनाई करती हूँ ...... तो…

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जिन्दगी

ठहरी हुई हुं, सिमटी हुई हुं, ख्वाबों की अपनी सी इक दुनिया मे खोयी हुई हुं, जिन्दगी के मोतियों को खुद मे अपनी मुस्कान से पिरो रही हुं, हाल-ए-दिल कैसे करें बयां मुस्कान…

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एक पत्र तारों के नाम

ओ टिमटिमाते तारे, सुदूर गगन मे विचरण करनेवाले, चंदामामा के दोस्त, कैसे हो आजकल ? बादलों की धुंध मे साफ़-साफ़ दिखते भी नहीं हो ! पूरी रात एक जैसी ऊर्जा के साथ ड्यूटी…

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वीरता

मैं युद्धमंत्र , रणभूमि हूँ , मैं पुण्यफलन संघर्षों की , देखो पन्नों को पलट आज साक्षी हूँ कितने वर्षों की , जब-जब प्रत्यंचा चढ़ी कहीं तुमने मेरी टंकार सुनी , जब शंखनाद…

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सूखा पेढ़

सूखे हुए पेढ़ की अधटूटी टहनी पर आपस में लिपटे ख्वाबो में डूबे बैठे हैं कौन वो,? ,वो जिन्हें पता नहीं ख्वाबो से दूर कही वास्तविकता के स्तर पर सूखे हुए पेढ़ की…

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एक खूबसूरत अहसास है बेटियाँ

औरत को किसी भी तरह की प्रसिद्धि की आवश्यकता नहीं है । तुम्हारा सबसे पहला स्वरुप ही बेटी है । औरत शब्द तक पहुँचते-पहुँचते अनेक स्वरुपों से होकर गुजरना पड़ता है । आज…

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मन की शक्ति

सिर्फ मनुष्य में ही विचार की एक ऐसी शक्ति है , जिसको काम में लाने से वह अपना उद्धार कर सकता है । मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना…

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कुसंगति का फल

कुसंगति का फल सेठ करोड़ीमल का रोहित इकलौता पुत्र था। उसका अधिकाँश समय अपने आमों के बागों में बीतता था। वहाँ उसके दो - चार दोस्त बन गए थे। उनकी संगति में रोहित…

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और भी दूँ

मन समर्पित , तन समर्पित , और यह जीवन समर्पित । चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ । माँ तुम्हारा ऋण बहुत है, अकिंचन किन्तु इतना कर रहा, फिर…

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