पुन:मिलन की पुकार

राधा की सुनी आँखों ने , फिर से तुम्हे पुकारा है। हे द्वारिकाधीश सुनो , ये गोकुल धाम तुम्हारा है।   तुम कान्हा से श्री कृष्ण बने, बने मथुरा के पालनहार । वासुदेव…

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पंचायत

"अरी कलमुँही यह क्या कर दिया तुमने? किस पाप की सज़ा दी है। " "भाग्यवान क्यों डाँट रही हो सुधा को? क्या हुआ है ऐसा!" "सुधा के बापू हम तो कहीं मुँह दिखाने…

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ऊंट की दुर्गति

किसी  जंगल में मदोत्कट नाम का एक शेर रहता था | चीता, कौआ और गीदड़ उसके सेवक थे | एक बार उन्होंने अपने साथियों से छूटा इधर-उधर घूमता हुआ क्रन्थनक नामक ऊंट देखा…

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श्यामा

भादों की अष्टमी थी और उस दिन शायद रोहिणी नक्षत्र भी था। भयंकर काली घटाएँ आसमान में छायी थीं जो गरज-गरज कर उसे जन्मदिन की बधाई दे रही थीं। आखिर आज ही के…

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युग प्रवर्तक : महात्मा गांधी

(गांधी जयन्ती पर विशेष) भारतभूमि को रत्नगर्भा कहा जाता है। रत्नगर्भा होने का अभिप्राय केवल यह नहीं है कि इस धरती में अनेक मूल्यवान रत्न छिपे हुए हैं, बल्कि इस धरती ने ऐसे…

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अपने हृदय का प्यार मुझे दो

बस इतना उपहार मुझे दो। अपने हृदय का प्यार मुझे दो।।   ले लूँ तेरे मन की पीर। ले लूँ सारा लोचन नीर।। बस इतना अधिकार मुझे दो। अपने हृदय का प्यार मुझे…

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दिल पत्थर का बना दिया

प्यार रहा न पीर रही, लो दिल पत्थर का बना दिया। चाह रही न प्यास रही, अश्क़ों का सागर सुखा दिया।। हमने भी स्वप्न सजाए थे। कितने उपवन महकाए थे।। लेकिन ऐसा पतझड़…

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कैसे रिश्तों को बुनते हैं?

बुनकर से भी सीख न पाया, कैसे रिश्तों को बुनते हैं। जिस धागे में सब बिंध जाएँ, कैसे वह धागा चुनते हैं।।   अपने सपनों की बगिया में, हमने जिनके फूल खिलाए। उन…

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प्यार हो तुम मेरा

प्यार हो तुम मेरा, तुम मेरी प्रीत हो। उम्र भर गुनगुनाऊँगा, वह गीत हो।।   अधखिले फूल जैसे तुम्हारे अधर। दो चपल ये नयन जैसे गुंजित भ्रमर।। प्रेरणा तुम मेरी, मेरे मनमीत हो।…

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इतना प्यार मुझे मत देना

इतना प्यार मुझे मत देना, कहीं पीर मैं भूल न जाऊँ। और खुशी इतनी मत देना, नयन नीर को रोक न पाऊँ।।   दुख-सुख धूप छाँह हैं जैसे, पाहुन जैसा आना-जाना। सुख की…

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हठीला मन

दर्द मिला है, पर न माने, कैसा पागलपन है। फिर से प्यार के सपने देखे,बड़ा हठीला मन है।।   सुधियों की घनघोर घटाएँ, अन्तस पर छाती हैं। उमड़-घुमड़कर बार-बार फिर नयनों तक आती…

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झूठे सारे रिश्ते-नाते

झूठे सारे रिश्ते-नाते, झूठी सारी अभिलाषाएँ। स्वार्थलिप्त सब इस दुनिया में, झूठी हैं परहित आशाएँ।।   जिसका अपना समझा उसका, तन उजला है, और मन काला। होठों पर है मीठी बोली, हाथों में…

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पत्थर कर डाला

शीशे जैसे दिल को मेरे, दुनिया ने पत्थर कर डाला। हरी-भरी धरती को बहते, लावे ने बंजर कर डाला।।   आशाओं के पंख लगाकर, स्वप्न-गगन में हम विचरे थे। नींद खुली तो पाया…

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