वर्षा सुन्दरी

झनन -झन झनकाती घुघरूँ पहन के वो पाजेब भारी ठुमकती आ रही वर्षा सुन्दरी मधु स्मित सी भर के मधु मुस्काँ लजाती खड़ी हरी -भरी हो धरा प्यास बुझाती मन रिझाती मेघा घिरे…

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अजगर

राजनीति भी अजगर जैसी हो गई है सरक -सरक जो चलती है विशालकाय तन वाली वंश परम्परा चलती यहाँ राजनीति में बाप बेटा दामाद सब अजगर से बन जाते नोंच -नोच जनता को…

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खुदा जाने क्यों

आपसे हूँ अब गुलजार खुदा जाने क्यों हर बुरे वक्त तू आधार खुदा जाने क्यों लाड़ मेरे अन्दर था निकला वो वाहर हो गयी है दिल की हार खुदा जाने क्यों पास वो…

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दर्द का रिश्ता

तुझसे सिर्फ दर्द का रिश्ता है.. जख्म दिल का थोड़ा-थोडा रिसता है। ----------------------------------------- खुशियाँ हमने लुटाकर दर्द बाँटा है.. मानो ज़हर पीकर अमृत चाटा है।। ------------------------------------------ दवाये-दुआये होती सिर्फ नाम की.. दौलते-शौहरतेे भी…

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खिचाव

समाजसेवी मित्र के साथ एक दिन मुझे वृद्धाश्रम जाना हुआ जैसे ही हमारी कार उस परिसर में जाकर ठहरी, सभी वृद्धाएं एक साथ अपने-अपने कमरों से बाहर आकर , हाथ जोड़कर खड़ी हो…

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खुदा हो गया

उस खुदा संग रहकर खुदा हो गया मैं सनम खुद से ही अब जुदा हो गया 1-थी रगों में मेरी बेवफ़ाई मगर संग रहकर तेरे बावफ़ा हो गया 2-प्यार अपनों से करता बहुत…

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पथिक

रदय गर्वित मन आनन्दित अधरों पर स्फुटित स्वाबलंबी मुस्कान । ……………. पकड़े रहना राह जकड़ कर जीवन में सम्भावित हैं हे पथिक, तिरस्कार । ……… शपथ भूमि की माथे पर नही धूलि दरबारों…

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प्रणाम

प्रणाम प्रेम है। प्रणाम अनुशासन है। प्रणाम शीतलता है। प्रणाम आदर सिखाता है। प्रणाम से सुविचार आते है। प्रणाम झुकना सिखाता है। प्रणाम क्रोध मिटाता है। प्रणाम आँसू धो देता है। प्रणाम अहंकार…

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उम्र

आज मुलाकात हुई जाती हुई उम्र से मैने कहा जरा ठहरो तो वह हंसकर इठलाते हुए बोली मैं उम्र हूँ ठहरती नहीं पाना चाहते हो मुझको तो मेरे हर कदम के संग चलो…

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मकड़ी, चीँटी और जाला

एक मकड़ी थी. उसने आराम से रहने के लिए एक शानदार जाला बनाने का विचार किया और सोचा की इस जाले मे खूब कीड़ें, मक्खियाँ फसेंगी और मै उसे आहार बनाउंगी और मजे…

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कौन??

मैं रूठा, तुम भी रूठ गए, फिर मनाएगा कौन ? आज दरार है, कल खाई होगी, फिर भरेगा कौन ? मैं चुप, तुम भी चुप, इस चुप्पी को फिर तोडे़गा कौन ? बात…

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मन की चादर

निचोड़ दो मुझे गीले कपड़े की तरह निचुड़ जाए सारी मैल जो मन की चादर पर लगी द्वेष, निर्मोह झूठ, कपट फरेब की मैल जो मन की चादर जमी जन्म बीत गए धोते…

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कम्बक्त दिल भी देखो तो

कम्बक़्त दिल भी देखो तो…. तुम पे ही आना था? क्या सिर्फ़ तुम ही ज़माने में मेरे मिजाज़ का दिल रखते हो? खादी का कुर्ता तो दिल्ली में कई चालीस पार कर चुके…

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अंतिम प्रार्थना

पटना के घाट पर बैठे शैलेन्द्र ने जब पैर पानी में डाला तो लगा जैसे हजार बिच्छुओं ने एक साथ डंक मार दिया हो। पानी तीर की तरह चुभ रहा था। शैलेन्द्र ने…

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