लेखक का अंतर्द्वंद

सोच रहा था क्या लिखूं, द्वन्द हो रहा था अंतर्मन में|
कुछ लिखूं फिर मिटा डालूं, हलचल थी मेरे मन में|
कुछ लिखा राजनीति पर, तो कभी शब्दों मैं हास्य बसा था|
कुछ रचनाएँ मॅहगाई की थी, तो किसी कविता मैं प्यार बसा था

वार्तालाप

मेरी बेटी, “पिताजी! ईमानदारी क्या है?” स्वयं, “आज के ज़माने में समझदारों और बेवकूफ़ों को अलग करती सीमा-रेखा!” बेटी, “और …