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वो बूढ़ा बरगद

By | 2018-02-05T17:09:45+00:00 February 5th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |

था मेरे गाँव में एक बूढ़ा बरगद, छाँव में बैठ दादा होते थे गदगद। पुरे गांव का किस्सा पता था जिसे, कौन सच्चा कौन झूठा पता था उसे। उसी के छाँव में बैठ रिश्ते बना करते थे, दुःख-सुख सब एक दूसरे की बयां करते थे। पीढ़ी दर पीढ़ी जहाँ खेल कूद बड़े हुए थे, सालो से रस्सी के झूले जहाँ लगे हुए थे। लेकिन अब न झूला है न वो छाँव, वीरान सा हो गया जैसे मेरा गांव। गुजरी है उसके वजूद से सड़क चकचक, कितनी यादों को ले दफ़न हो गया वहीं- वो बूढ़ा बरगद। -निर्भय।