तौबा! यह दोगले लोग (हाय-व्यंग्य कविता)

मगर बुराई करें, कोसे पीठ पीछे,
आपसे मिले वोह बड़े हमदम बनकर,

देश की स्वतंत्रता का आज ऐसा हाल है

चंद पैसों के लिये ही जिंदगी को मारता
रात दिन करके वो मेनत जीतकर भी हारता