झूठे मुखौटे (लघुकथा)

दूसरे ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, "उसका तो मुझे नहीं पता, लेकिन तुम्हारे मुखौटे की हर रग और हर रंग को मैं बखूबी जानता हूँ।

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कुछ दोस्त पुराने याद आ गये

गुजरे हुए जमाने याद आ गये, कुछ दोस्त पुराने याद आ गये. करते थे जो साथ में मस्ती, वो बीते अफसाने याद आ गये. घुमा करते थे जो हाथ पकड़कर, वो दिवाने याद…

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वो कहते है हम भीड बनाकर चलते है…

गजल... वो कहते है हम भीड़ बनाकर चलते है... वो कहते है हम भीड़ बनाकर चलते है हम तनहाई मे जलते और उबलते है !! वो हमको अपना कहते है फिर भी हमको…

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वो और मेरा प्यार

सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है प्यार दिलवालों से करो तो क़बूल होता है ये प्यार कोई माचिस की तीली नहीं जब होता है तो हरपल, भरपूर होता है वो…

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हाउसवाइफ

रमेश कैसे हो यार खुशी से अनिल अपने दोस्त से गले लग जाता है "बहुत साल हो गए मिले हुए घर में सब कैसे हैं" अनिल ने उत्सुकतापूर्वक अपने दोस्त से पूछा |…

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