माँ(एक कविता)

ये कविता एक माँ के प्रति श्रद्धांजलि है। इस कविता में एक माँ के आत्मा की यात्रा स्वर्गलोक से ईह्लोक पे गर्भ धारण, बच्ची, तरुणी, युवती, माँ, सास, दादी के रूप में क्रमिक विकास और फिर देहांत और देहोपरांत तक दिखाई गई है।

ज़रा सोचो समझो विचार करो

विलुप्त हुए झरने और तालाब
जंगल के जीव-जंतु हुए बेहाल
जिस धरती की शोभा बढ़ाने
एक एक सजीव है अनमोल रत्न!!

धरती को धरती ही रहने दो

रो रही है धरती, आसमां देख रहा है,
बेबसी पर धरा की, वह भी तड़प रहा है,
क्या करोगे बना कर, मंज़िलों के महल,
जब बच ही न पायेगी ज़मीं, उगाने को फसल ।

गजब के गोरखा

हिंदुस्तान गजब की धरती,अजब है इसकी शान। वीरों से खाली नहीं होती, योद्धाओं की खान।। गुरंग, राय, मागर, लिम्बू, योद्धा …

हे मानव तुम जैसा नहीं हूँ मैं

हे मानव में तुम्हारे जैसा नहीं हूँ दो हाथ,दो पैर,आँख,व दिल वाला फिर भी संवेदनाओं को समझता हूँ,महसूस करता हूँ, …

बाबा दी पाठशाला

* पाकिस्तान के पेशावर में विश्वविद्यालय पर हुए आतंकी हमले पर लिखी गई पंजाबी कविता :- * * * बाशा …

प्यारा हिंदुस्तान माँगता हूँ

प्यारा हिंदुस्तान माँगता हूँ =================== सदा बुलंदी पर परचम लहराये भारत का हो नतमस्तक दुनिया सारी गुण गान गाये भारत …