मेरे हिस्से का आसमान

हाँ लेकिन अब सभी फ़र्ज़ पूरे हो गए | बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए जितना कर सकी किया| सब के लिए बहुत जी मर ली | सभी ने तो अपनी ज़िन्दगी में जो चाहा वो किया | मैं ही कभी मन की नहीं कर पायी जब भी चाहा अपने लिए कुछ तब परिवार की कोई न कोई ज़िम्मेदारी पाँव की बेड़ी बन गयी | उदय भी तो मंझधार में छोड़ गए मुझे | वो भी ऐसे समय जब मुझे उनकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत थी |

जिसने तुझे राेका हुआ

वशीभूत तू मन के तकी जिसने तुझे राेका हुआ देख तेरे साथ अब कितना बडा़ धाेखा हुआ ।। खुशनसीबी क्या …