गोलगप्पा अर्थात पानी पूरी अर्थात पुचका

कोई खावे सौंठ के साथ कुछ चटनी के लेवें,
दौना भर कै पानी पियें फिर सूखी पापड़ी लेवें

नारी नहीं अबला और बेचारी

नारी क्या लिखू मे तुझपे क्या बयान करू जज़्बात कहे तुझे कोई अबला और बेचारी नहीं रही तू अब वह …

बगावत बेचारा पुरुष

क्यों नहीं सोच पाती लड़कियां सिर्फ अपने बारे में क्यों सुख ढूंढती हैं वो पुरुष की अधीनता में क्यों चाहिए …

मेरे हिस्से का आसमान

हाँ लेकिन अब सभी फ़र्ज़ पूरे हो गए | बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए जितना कर सकी किया| सब के लिए बहुत जी मर ली | सभी ने तो अपनी ज़िन्दगी में जो चाहा वो किया | मैं ही कभी मन की नहीं कर पायी जब भी चाहा अपने लिए कुछ तब परिवार की कोई न कोई ज़िम्मेदारी पाँव की बेड़ी बन गयी | उदय भी तो मंझधार में छोड़ गए मुझे | वो भी ऐसे समय जब मुझे उनकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत थी |

माँ तो माँ होती है

माँ तो बस माँ ही होती है, क्या सगी, क्या सौतेली. मगर यह समझता है कौन, वह है एक अनबुझ …