रूठे न तू बस हमसे

तू रूठे न बस हमसे हमसे जाके दूर तू,भूल न जाना यार। ज़रूर करना फ़ोन तू,रोज एक दो बार।। रोज एक दो बार,प्यार रहे सदा ताज़ा। सुख-दुख होते रहें,साँझा सदैव लिहाज़ा। सुन प्रीतम…

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नारी -सुरक्षा व् सम्मान : एक अनसुलझा प्रश्न (कविता)

क्या  नारी  कहीं सुरक्षित है ? अपने घर , या  घर के बाहर ! पड़ोसियों  के घर ? करीबी या दूर के रिश्तेदारों के घर, ननिहाल /ददिहाल ?, कहाँ? और बाहर ..... शोपिंग…

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हरजाई ख़ुशी (ग़ज़ल)

छुपके  नज़रों से  मेरे  गुज़र  जाती  है , यह हरजाई ख़ुशी क्यों मुझे तडपाती है . कोई बेशुमार तो नहीं है मेरी  चाहतें , बस थोड़े से अरमान है जो कुचल देती है.…

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क्या साल पिछला दे गया

कुछ देर मैं पथ पर ठहर, अपने दृगों को फेरकर, लेखा लगा लूँ काल का जब साल आने को नया! क्या साल पिछला दे गया? चिंता, जलन, पीड़ा वही, जो नित्य जीवन में…

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इकरार-ऐ-मुहोबत

  यूँ तो गुजरने को गुज़र जाती है ज़िदगी मगर वोह बात कहाँ जो तेरे पहलु में है. दुनिया की मुहोबत बेशक हो साथ मगर, मगर सच्चा इकरार तो तेरे साथ है. दौलत…

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काश !तुम रूबरू होते … (ग़ज़ल )

(मेरे अज़ीज़  फनकार के नाम प्रेम -पत्र )   ऐ मेरे हमदम ,हम राज़ ,काश तुम रूबरू होते ... यूँ  तो हो जाता है दीदार ,तुम्हारी तस्वीर से मगर , क्या   लुत्फ़…

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