एक अजीब दास्ताँ

एक अजीब दास्तान इश्क़ की पढ़ी मैंने गलियां फूलों की छोड़, काँटों की राह चुनी मैंने सबकी प्यास बुझाती नदियां …

हँस हँस कर दर्द भूलाता हूँ…

तुमने अभी कहां जाना है मुझको कितना पहचाना है ! रो रो कर प्यास जगाता हूँ हँस हँस कर दर्द …