ये जिन्दगी

ये जिन्दगी हे, बस यूं ही कटती चली जायेगी, क्या होगा इसका ये नहीं कोई बता पायेगा, कोई हंसते, कोई रोते तो कोई रूलाकर छोड जायेगा, बीत गया इसका पल वो सुहाना नही…

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गुम होता बचपन

ज़िदगी की शोर में गुम मासूमियत बहुत ढ़ूँढ़ा पर गलियों, मैदानों में नज़र नहीं आयी, अल्हड़ अदाएँ, खिलखिलाती हंसी जाने किस मोड़ पे हाथ छोड़ गयी, शरारतें वो बदमाशियाँ जाने कहाँ मुँह मोड़…

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बचपन

कंचन की ललक, कंचन का भार, कर रहे हैं आज हमें लाचार| तब मन के मंच पर आकार बचपन, खोलता  स्मृतियों का प्रशस्त द्वार||१|| ये तामझाम! ये चकाचौंध! ये  वैभव विलास का प्रदर्शन…

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बचपन

याद आता है मुझे, मेरा वों बचपन, हल्की-हल्की सर्द हवाएँ, और वो पुरानी अचकन। वो नंगे पाँव घर से भागना, दोस्तों संग मस्ती, कोई मुझे लौटा दे, वो सावन की हस्ती। देखता हूँ…

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वो बूढ़ा बरगद

था मेरे गाँव में एक बूढ़ा बरगद, छाँव में बैठ दादा होते थे गदगद। पुरे गांव का किस्सा पता था जिसे, कौन सच्चा कौन झूठा पता था उसे। उसी के छाँव में बैठ रिश्ते बना करते थे, दुःख-सुख सब एक दूसरे की बयां करते थे। पीढ़ी दर पीढ़ी जहाँ खेल कूद बड़े हुए थे, सालो से रस्सी के झूले जहाँ लगे हुए थे। लेकिन अब न झूला है न वो छाँव, वीरान सा हो गया जैसे मेरा गांव। गुजरी है उसके वजूद से सड़क चकचक, कितनी यादों को ले दफ़न हो गया वहीं- वो बूढ़ा बरगद। -निर्भय।

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बचपन के दिन

बचपन की वो बातें प्यारी अपने होते खेल निराले कभी बन जाते रेलगाड़ी छुकछुक चलती अपनी गाड़ी काला दीपू इंजन बन जाता हम सब डिब्बे बन कर चलते छुप्पनछुपाई हम खेला करते कभी…

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हाउसवाइफ

रमेश कैसे हो यार खुशी से अनिल अपने दोस्त से गले लग जाता है "बहुत साल हो गए मिले हुए घर में सब कैसे हैं" अनिल ने उत्सुकतापूर्वक अपने दोस्त से पूछा |…

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