हमसे पहचानने में भूल हुई

तन मन तुझको सौंप दिया था, भगवान बना कर रखा था,
पर तूने तो उस मनमंदिर में, शैतान बसा कर रखा था

देश की स्वतंत्रता का आज ऐसा हाल है

चंद पैसों के लिये ही जिंदगी को मारता
रात दिन करके वो मेनत जीतकर भी हारता

कालिदास और कलिभक्त

जो मित्र कार ड्राइव कर रहे थे उन्होंने विडोव-मिरर नीचे कर दिया। नवयुवतियां मुस्कुराने लगी…

दुख में ही भगवान को…

कुछ समय बाद पता चला की सुखों की पोटलियाओं का पता ही नही चला सब ख़त्म हो गयी, दुखों की पोटलियों पर किसी ने हाथ नही लगाया|

नाले की पुकार

निर्मल स्वच्छन्द बहती हूँ जहाँ भी मैं जाती हूँ,
तट पर मेरे हज़ारों आते हैं मुझे माता कहकर बुलाते हैं,
हर जगह मान है मिलता मुझको, भगवान सी पूजी जाती हूँ,
भगवान पर चढ़े फूल मुझमें अर्पण होते हैं वरदान मिला है मुझे,
मैं दुनिया की प्यास बुझाती हूँ।