बजरी बजरी

मेरी मौलिक रचना " बजरी " अवश्य पढ़ें (1) रचना - बजरी इंसाँ के हाथों मारी गई बड़े बड़े हाथोड़ो से कुचला गया , कभी राह में लात मारी तो कभी गलियों में…

Continue Reading

मेरा गांव

मेरा  गांव तेरे  शहर से  अच्छा है। इस्लाम  चाचा हों, या  भूरी काकी, जानता मुझको  बच्चा  बच्चा है। घर भले ही  गारे  मिट्टी के कच्चे हों, लेकिन  दिल उनका  सच्चा है।

Continue Reading

जीवन – जाच ( दो )

  ओ करमां वालयो ! कंन धर के सुण लओ उसदी जेहड़ा सुणे तां फेर सुणावे किद्धर गए मंजियां दे सेरू किद्धर तुर गए पावे जिस तन लग्गी सोई जाणे दूजा ऐवें मन…

Continue Reading

कविता की पेड़

कविता की पेड़ बड़े होने के लिए जरूरत नहीं पड़ती उर्वरा मिट्टी की रसायनिक खाद की कविता की पेड़ बड़े होने के लिए जरूरत होती है आजाद मन की खाली जमीन नरम दिल…

Continue Reading
Close Menu