गर मुँह दिया है  तो जरूर सच्ची ज़ुबान देना 

जितना जी चाहे ,तुम खूब मेरा इम्तहान लेना ज़िंदगी, पहले तुम मुझे जीने का सामान देना मैं छोड़ सकूँ अपने निशाँ मंज़िल …

शुक्रिया ज़िन्दगी . . . . . !

* यादों के झरोखे से * * * प्रस्तुत कविता / ग़ज़ल ७-३-१९७३ को लिखी गई थी । लेकिन, इसका …

नफरत है आग, मोहब्बत है रोशनी

कोई राम पर लड़ रहा है कोई इस्लाम पर लड़ रहा है किसी को कीर्तन पसन्द नहीं कोई अज़ान पर …