टिक-टिक-टिक, चटर पटर

आज सूरज कितना निस्तेज हो रहा है, दिन के एक बजे जब उसे अपने परम तापमान पर होना चाहिए, बिंदी जैसा चमक रहा है आसमान के चेहरे पर, और ये दुष्ट कोहरा जैसे सूरज को ज़ंग में हराने को अमादा हो जैसे कह रहा हो -“निकल कर दिखा, देख मैं धुआं धुआं सा कोहरा तेरा तेरा रास्ते रोके खड़ा हुँ|

संध्या की जलन

ऊषा इतनी गोरी है, मैं क्यों काली काली हूँ,
ऊषा की तरह मैं भी चाहती हूँ ,
स्वर्णिम सी चमकना,
दुनिया भर में अपनी किरणें चाहती हूँ बिखेरना।