निर्माण

नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर! वह उठी आँधी कि नभ में छा गया सहसा अँधेरा, धूलि धूसर बादलों ने भूमि को इस भाँति घेरा, रात-सा दिन हो गया, फिर रात…

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तुम तूफान समझ पाओगे?

तुम तूफान समझ पाओगे? गीले बादल, पीले रजकण, सूखे पत्ते, रूखे तृण घन ले कर चलता करता 'हरहर' - इसका गान समझ पाओगे? तुम तूफान समझ पाओगे? गंध-भरा यह मंद पवन था, लहराता…

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इस पार, उस पार

1 इस पार, प्रिये, मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा! यह चाँद उदित हो कर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का, लहरा-लहरा यह शाखाएँ कुछ शोक भुला देतीं…

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क्या साल पिछला दे गया

कुछ देर मैं पथ पर ठहर, अपने दृगों को फेरकर, लेखा लगा लूँ काल का जब साल आने को नया! क्या साल पिछला दे गया? चिंता, जलन, पीड़ा वही, जो नित्य जीवन में…

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जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला। जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा मैं खड़ा…

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जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया अंबर के आंगन को देखो कितने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर…

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क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर, पलक संपुटों में मदिरा भर, तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था? क्षण भर को क्यों प्यार किया था? 'यह अधिकार कहाँ से लाया!' और…

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कहते हैं, तारे गाते हैं

कहते हैं, तारे गाते हैं। सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमने कान लगाया, फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं। कहते हैं, तारे गाते हैं। स्वर्ग सुना…

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किस कर में यह वीणा धर दूँ?

देवों ने था जिसे बनाया, देवों ने था जिसे बजाया, मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ? किस कर में यह वीणा धर दूँ? इसने स्वर्ग रिझाना सीखा, स्वर्गिक तान…

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कवि की वासना

कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! 1 सृष्टि के प्रारम्भ में मैने उषा के गाल चूमे, बाल रवि के भाग्य वाले दीप्त भाल विशाल चूमे, प्रथम संध्या के अरुण दृग चूम…

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था तुम्हें मैंने रुलाया!

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा! हाय, मेरी कटु अनिच्छा! था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया! था तुम्हें मैंने रुलाया! स्नेह का वह कण तरल था, मधु न था, न…

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अँधेरे का दीपक

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है? कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था, भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था, स्वप्न ने अपने करों से था…

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