सौ क़दम आगे 

क्यों बनाते हो मेरे लिए पिंजरा, झरोखा महसूस करती हूँ मैं भी सर्दी ,गर्मी , बरखा तो हूँ न मैं भी ! इंसान तुम्हारी तरह। संबंधों में पलती  हूँ सुख - दुःख में…

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बिखरा हुआ मन

बिखरा हुआ मन सिमटा हुआ तन कही मै भयभीत तो नही पर भय किसका ओ हा जमाने के ठेकेदारों का ये ठेकेदार बरसाती मेढक की तरह निकलते है आपके सुख में न जाने…

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पशु का अंतर्मन

सोच रहा होगा पशु मन में मुझको पशु कैसे कहते हैं मानव खाल मानव की पहने घुमतें मानव की खाल में हैं सब दानव इंसानो से प्यार नहीं घर में बुजुर्गो का सम्मान…

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पगली

वीरेंद्र काम से घर लौटा ही था,अभी ठीक से घर के भीतर पाँव भी नहीं रखा की घर में मच रहे शोर गुल से आग बबूला हो गया .....  बात ही कुछ ऐसी…

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गाँव को भूला चला 

शहर की चकाचौंध में मैं भी कितना खो गया रंग भरते - भरते जीवन में बेरंग कितना हो गया टुटी छप्पर चुते पानी खिलखिलाहट की मस्ती सारी ताल तलैया बाग बगिचा झोड चला…

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शुभ-नाम

अपने सारे पाखण्ड-ढोंग,तेरे सारे शुभ काम लिखूँ, ये आज मेरा भी मन है कि मैं गीत मे तेरा नाम लिखूँ,, वो नाम तेरा जो सॉसों की माला पर जपते रहते हैं, पत्थर से…

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नारी या देवी

नारी को देवी कहा.... पर माना है कहा? कथनी और करनी मे भेद है तो न्याय है कहा? पिता से पति तक कष्ट झेलती नारी.... सुनो ना विधवा की कहानी... आ जाए ना…

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आदमी की चाह

आदमी को चाहिए दो जोड़ी कपड़े भरपेट भोजन और सिर पर छप्पर जब यह मिल जाता है तो आदमी को चाहिए एक बंगला चार पहिये वाली गाड़ी और बैंक बैलेंस जब यह भी…

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पीपल का पत्ता 

पीपल का पत्ता जब गुलाबी कोपलों की  नर्म खिड़कियों से बाहर झाँकते हुए प्राकृतिक परिवेश में अठखेलियाँ करने लगता है तब उसे ज्ञात नहीं होता क़ि उसकी उमंग का इक सीमित दायरा भी…

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वो बूढ़ा चिनार

कलियाँ मना रही थीं मातम सियासत में खिल रहे थे रंगबिरंगे गुलाब... चल रहे थे बांस कभी वर्दीसहित कभी वर्दीरहित, कहीं छिड़ रही थी पत्थर-गोली की जंग कहीं बुझ रहा है विधवा माँ…

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जरुरत क्या है

रात दिन अश्क बहाने की बहाने की जरुरत क्या है बेसबब खुद को मिटाने की जरूरत क्या है। और भी गम है जमाने मै मौहब्बत के सिवा बेसबब दिल को लगाने की जरुरत…

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दुनियादारी

सार जग का केवल निहित है रोटी में दुनियादारी भी रोटी के चहुँ ओर चलती है चार दिन को केवल ठहरें मनुष्य यहाँ पर ना जाने कब उठ जायें बोरी -बिस्तर जहाँ से…

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