गर्मी के हाइकु

  लू की सखियाँ अंधड़ – बवंडर गर्मी बतियाँ || लू का कहर ढूंढे छांव शहर कांक्रीट दर || जिद्दी पसीना धूप – पसीना की बातें बताने आता || धूप बेचारी छांव ढूंढने…

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रिश्ते 

रिश्ते अब तो रिसने लगे हैं कभी - कभी तो टीसने भी लगे हैं आजकल इतने बनावटी औऱ खोखले हो गए हैं रिश्ते कि ऊपर से कछुए जैसी मोटी खाल का मुखौटा लगा…

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झूठा -शक्ल

ऐ जिस्म है तो क्या हुआ ये रूह का आवाज है ऐ आवाज है तो क्या हुआ ये निगाहो की बानगी है ऐ जिस्म तू तो बड़ा जिस्मफरोश है तेरे ही चलते रूह…

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सूना आंगन

बलदेव का घर बरसों से नन्हे नन्हे कदमों में बंधी चाँदी की पाजे़बों की छम छम से आबाद रहा। घर में जब चारों बेटियां इक्ट्ठी घुमती तो कोई संगीत का साज सा बजता…

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प्रकृति सुषमा

फलित सृष्टि विस्तारित प्रकृति करे श्रृंगार द्रुम पल्लव हरे धरती नार पुष्प हरसिंगार मस्ती में खेलें सागर की लहरें गाती रागिनी महकती चाँदनी गिरि हृदय खिलखिलाती नदी झरे निर्झर बिचर रहे खग शीत…

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जिनको भड़काया गया हो आसमानों के खिलाफ़

जिनको भड़काया गया हो आसमानों के खिलाफ़। वे  भला  चुप  क्यों  रहेंगे हुक्मरानों  के खिलाफ़ ॥1। जिन पूँजिपतियो के हरम मॆ रह रही हो राजनीति। वह भला क्योंकर कहे उन खानदानों के खिलाफ़॥2॥…

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हमारा अनुभव”

तुम्हारा अनुभव कहीं गलत तो नहीं हैं ? एक बार मूल्यांकन करलें। तुम जिस समूह में  थे क्या आज वह समूह तुम्हारे साथ है ? एक बार पुनः परीक्षण करलें। रही बात आधार…

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मेरी अंतिम इच्छा

मेरी अंतिम इच्छा है इहलोक त्याग जब जाउँ मैं वौदिक धर्म रीति से जाँउ नहीं जलाई मैं ! नौ मन लकड़ी जल जायेगी होगी देह जब भस्म मेरे अनगिन पेड़ कटेगें भू पर…

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आत्ममंथन से व्यंग्यमंथन तक

वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल की पुस्तक "कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की " जब मेरे हाथों में उन्होंने सौंपी, तो कुछ समय के लिए तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. बस दो पल…

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वो क्या शजर है जिसमें न पत्ता दिखाई दे

  वो क्या शजर है जिसमें न पत्ता दिखाई दे। गुलशन का कोना-कोना ही सहरा दिखाई दे।। हद्द हो चली है जेहद ए मुसलसल की काविशे। क्या  बात  है न कोई ,जजीरा  दिखाई…

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हम तो बेशउर है

बड़े शहर के रिवाज का कुछ अलग ही दस्तूर है, हम तो निपट गांव के हैं हम तो बेशउर है, कोई भी ना उठाएगा रास्ते में जो घायल तुम हुए सबके पास है…

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अगर तुम नहीं मिलते

अगर तुम नहीं  मिलते  मुझको मन  की साध कुंवारी  होती। कली  हृदय  की खिली न होती यह  उदास  फुलवारी  होती। अगर   चाँदनी   नहीं   बरसती उगे   हुए  अंकुर   कुम्हलाते। सृजन   अधूरा   ही   रह  जाता…

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आज के परिप्रेक्ष्य में शिक्षक

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूँ पाँय बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय। आज भी इस दोहे को पढ़ते हुए गुरु की महत्ता का अहसास होता है, ऐसा महसूस होता है कि सचमुच…

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