प्रकृति सुषमा

फलित सृष्टि विस्तारित प्रकृति करे श्रृंगार द्रुम पल्लव हरे धरती नार पुष्प हरसिंगार मस्ती में खेलें सागर की लहरें गाती …

जिनको भड़काया गया हो आसमानों के खिलाफ़

जिनको भड़काया गया हो आसमानों के खिलाफ़। वे  भला  चुप  क्यों  रहेंगे हुक्मरानों  के खिलाफ़ ॥1। जिन पूँजिपतियो के हरम …

आत्ममंथन से व्यंग्यमंथन तक

वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल की पुस्तक “कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की ” जब मेरे हाथों में उन्होंने सौंपी, तो …

वो क्या शजर है जिसमें न पत्ता दिखाई दे

  वो क्या शजर है जिसमें न पत्ता दिखाई दे। गुलशन का कोना-कोना ही सहरा दिखाई दे।। हद्द हो चली …

आज के परिप्रेक्ष्य में शिक्षक

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूँ पाँय बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय। आज भी इस दोहे को पढ़ते हुए …